Last updated: February 20th, 2026 at 01:30 pm

देहरादून/ शहर के अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक में सामने आए कथित ऋण घोटाले ने बैंक प्रबंधन और खाताधारकों के बीच तनाव बढ़ा दिया है। बैंक की वित्तीय स्थिति बिगड़ने के बाद मामला खुलकर सामने आया और हालात ऐसे बने कि भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को हस्तक्षेप करना पड़ा। मामले को लेकर खाताधारकों ने पूर्व प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि वर्षों तक अनियमितताओं पर ध्यान नहीं दिया गया, जिससे बैंक की स्थिति कमजोर होती चली गई। हालांकि वर्तमान प्रबंधन इन आरोपों को स्वीकार करने से इंकार कर रहा है।
2013-14 के ऋण वितरण पर सवाल
बैंक के चेयरमैन मयंक ममगाईं का कहना है कि अनियमितताएं वर्ष 2013-14 के दौरान हुईं। उनके अनुसार, उस समय के सचिव आर.के. बंसल और तत्कालीन प्रबंधक संजय गुप्ता की कार्यशैली के कारण बैंक को नुकसान उठाना पड़ा। मौजूदा सचिव बीरबल ने बताया कि लगभग 24 लोगों को जेसीबी (बैक हो लोडर) मशीन खरीदने के लिए ऋण स्वीकृत किए गए थे। आरोप है कि इन ऋणों में आवश्यक प्रविष्टियां नहीं की गईं और नियमों की अनदेखी की गई। परिणामस्वरूप अधिकांश ऋण एनपीए में बदल गए और बैंक की वसूली अटक गई। पूर्व में हुई जांच में संबंधित अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई थी। अब तत्कालीन प्रबंधक संजय गुप्ता के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
आर्बिट्रेशन और उत्तराधिकार का मामला
मामला आर्बिट्रेशन तक भी पहुंच चुका है। इस बीच, तत्कालीन सचिव आर.के. बंसल का निधन हो चुका है। उनकी ओर से अब उनकी पत्नी ने अपील दायर की है। चूंकि उनकी संपत्ति और दायित्व उनके बेटे को हस्तांतरित हुए हैं, इसलिए वसूली प्रक्रिया में उन्हें भी पक्षकार बनाया जा रहा है।
बैंक गारंटी पर भी उठे सवाल
इसी बीच, एक शराब कारोबारी द्वारा आबकारी विभाग में प्रस्तुत की गई लगभग आठ करोड़ रुपये की बैंक गारंटी की सत्यता पर भी प्रश्नचिह्न लग गया है। जानकारी के अनुसार, यह गारंटी करीब पांच करोड़ रुपये की एफडी के आधार पर जारी की गई बताई जा रही है। जब यह आशंका सामने आई कि बैंक गारंटी में भी अनियमितता हो सकती है, तो जिला आबकारी अधिकारी वीरेंद्र जोशी अपनी टीम के साथ बैंक पहुंचे। बैंक ने गारंटी जारी होने की पुष्टि तो की, लेकिन उसे भुनाने की प्रक्रिया को लेकर स्पष्ट जवाब नहीं दे पाया। अब आबकारी विभाग बैंक को औपचारिक नोटिस जारी करने की तैयारी में है। यदि गारंटी की वैधता पर संदेह की पुष्टि होती है, तो इससे राजस्व सुरक्षा पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं।
आगे क्या?
बैंक प्रबंधन जहां पूर्व अधिकारियों को जिम्मेदार ठहरा रहा है, वहीं खाताधारक पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं। आने वाले दिनों में मुकदमा दर्ज होने और विभागीय कार्रवाई के बाद स्थिति और स्पष्ट हो सकती है। यह मामला न केवल बैंकिंग प्रशासन बल्कि वित्तीय संस्थानों की निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है।
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