Last updated: February 23rd, 2026 at 01:24 pm

देशभर के कथित फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची एक बार फिर जारी कर दी गई है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने फरवरी 2026 में 32 संस्थानों को फर्जी घोषित करते हुए उनकी सूची सार्वजनिक की है। इस सूची में उत्तर प्रदेश के चार संस्थानों के नाम भी शामिल हैं, जिससे प्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं।
यूजीसी द्वारा जारी सूची के अनुसार उत्तर प्रदेश से जिन संस्थानों को फर्जी बताया गया है, उनमें गांधी हिंदी विद्यापीठ, प्रयाग (इलाहाबाद), महामाया टेक्निकल प्राविधिक विश्वविद्यालय, महर्षि नगर (गौतमबुद्धनगर), नेताजी सुभाष चंद्र बोस यूनिवर्सिटी (ओपन), अलीगढ़ और भारतीय शिक्षा परिषद, भारत भवन, मटियारी, चिनहट (लखनऊ) शामिल हैं।
इन संस्थानों को यूजीसी ने स्पष्ट रूप से “फर्जी विश्वविद्यालय” की श्रेणी में रखा है। आयोग का कहना है कि ये संस्थान विश्वविद्यालय होने का दावा तो करते हैं, लेकिन इन्हें डिग्री प्रदान करने का कोई वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है।
स्थानीय स्तर पर भी कुछ संस्थानों के अस्तित्व को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। लखनऊ स्थित भारतीय शिक्षा परिषद के मामले में संबंधित पते पर वर्तमान में कोई विश्वविद्यालय संचालित नहीं पाया गया। परिषद की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार वर्ष 2014 में तत्कालीन निदेशक के निधन के बाद से ऑनलाइन और ऑफलाइन प्रवेश प्रक्रिया बंद बताई गई है। वेबसाइट के अनुसार संचालन केवल पुराने पाठ्यक्रमों के सत्यापन के लिए जारी है और मामला जिला न्यायालय में विचाराधीन है।
यूजीसी ने विद्यार्थियों और अभिभावकों को सख्त सलाह दी है कि किसी भी संस्थान में प्रवेश लेने से पहले उसकी मान्यता की आधिकारिक पुष्टि अवश्य करें। आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची उपलब्ध है, जिसे देखकर छात्र अपने भविष्य से जुड़ा सही निर्णय ले सकते हैं।
फर्जी विश्वविद्यालयों का जाल गांव-गांव तक फैल चुका है और हर वर्ष हजारों छात्र इनके झांसे में आकर अपना समय और धन दोनों गंवा देते हैं। ऐसे में छात्रों के लिए जरूरी है कि वे विश्वविद्यालय की मान्यता, NAAC ग्रेड, अप्रूवल लेटर, आधिकारिक वेबसाइट डोमेन (जैसे .edu.in या .ac.in), फीस संरचना और संस्थान के वास्तविक पते की जांच अवश्य करें।
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल सूची जारी करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इन संस्थानों के खिलाफ सख्त कार्रवाई भी जरूरी है, ताकि छात्रों का भविष्य सुरक्षित रह सके। फिलहाल यूजीसी की इस सूची ने एक बार फिर शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर बहस छेड़ दी है।
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