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माघ मेला विवाद और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद: आस्था, प्रशासन और राजनीति के टकराव की पूरी कहानी

प्रयागराज का माघ मेला सनातन परंपरा, आस्था और अनुशासन का प्रतीक माना जाता है। करोड़ों श्रद्धालु, अखाड़े और संत परंपरागत
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प्रयागराज का माघ मेला सनातन परंपरा, आस्था और अनुशासन का प्रतीक माना जाता है। करोड़ों श्रद्धालु, अखाड़े और संत परंपरागत नियमों और प्रशासनिक व्यवस्था के साथ संगम स्नान करते हैं। ऐसे में किसी भी धार्मिक पद पर बैठे व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह व्यवस्था, शांति और श्रद्धालुओं की सुरक्षा को प्राथमिकता दे।

Table of Contents

    कौन हैं शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और विवाद की शुरुआत

    हाल के दिनों में ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद एक बार फिर विवादों में आ गए, जब माघ मेले के दौरान उनके रथ यात्रा और संगम नोज तक जाने को लेकर प्रशासन से टकराव हुआ। प्रशासन द्वारा सुरक्षा कारणों से कुछ मार्ग बंद किए गए थे, लेकिन आरोप है कि नियमों की अनदेखी करते हुए रथ को आगे बढ़ाने का प्रयास किया गया।

    प्रशासनिक निर्देश और सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं

    प्रयागराज प्रशासन का कहना था कि लाखों श्रद्धालुओं की मौजूदगी को देखते हुए रथ से आगे जाना जोखिम भरा हो सकता है। प्रशासन ने पैदल चलने का सुझाव दिया ताकि किसी भी तरह की भगदड़ या अव्यवस्था से बचा जा सके। सवाल यह उठता है कि जब आम श्रद्धालु नियमों का पालन कर रहे हैं, तो क्या किसी विशेष व्यक्ति के लिए अलग व्यवस्था होनी चाहिए।

    राजनीतिक बयानों से बढ़ा विवाद

    विवाद केवल प्रशासनिक नहीं रहा। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के पिछले बयानों को लेकर भी सवाल उठे हैं। योगी आदित्यनाथ को संत मानने से इनकार, महाकुंभ प्रबंधन पर टिप्पणी, CAA को लेकर अलग रुख, अतीक अहमद मामले में न्यायिक जांच की मांग और बिहार विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा जैसे बयान उन्हें राजनीतिक बहस के केंद्र में ले आए। आलोचकों का कहना है कि ये बयान धार्मिक भूमिका से ज्यादा राजनीतिक एजेंडे की ओर इशारा करते हैं।

    अन्य शंकराचार्य और संतों की तुलना

    देश की चार शंकर पीठों में से अन्य शंकराचार्य और हजारों संत माघ मेले में शांतिपूर्वक स्नान कर चुके हैं। पुरी पीठ के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती सहित कई संतों की मौजूदगी में कोई विवाद सामने नहीं आया। इससे यह प्रश्न उठता है कि विवाद बार-बार एक ही नाम से क्यों जुड़ रहा है।

    नैरेटिव, ब्राह्मण समाज और 2027 की राजनीति

    आलोचकों का मानना है कि इन घटनाओं और बयानों के जरिए एक ऐसा नैरेटिव गढ़ने की कोशिश हो रही है, जिससे 2027 के चुनावों में धार्मिक और सामाजिक समीकरण प्रभावित हों। खासतौर पर ब्राह्मण समाज को राजनीतिक रूप से साधने की रणनीति की चर्चा भी तेज है।

    आस्था से ऊपर अनुशासन जरूरी

    माघ मेला जैसे विशाल आयोजन में व्यक्तिगत अहंकार या राजनीतिक संदेश से ज्यादा जरूरी श्रद्धालुओं की सुरक्षा और व्यवस्था है। संतों की भूमिका समाज को जोड़ने की होती है, न कि विवाद बढ़ाने की। आस्था तभी मजबूत रहती है, जब अनुशासन और जिम्मेदारी साथ-साथ चलें।

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