Last updated: January 29th, 2026 at 01:22 pm

संभल हिंसा मामले ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश की राजनीति और कानून व्यवस्था को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। एएसपी अनुज चौधरी, इंस्पेक्टर अनुज तोमर और 15 से 20 अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के सीजेएम कोर्ट के आदेश के खिलाफ अब इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया गया है। पुलिस अधिकारियों की ओर से दायर रिवीजन याचिका में इस आदेश को चुनौती दी गई है, जिससे मामला अब नई कानूनी दिशा में बढ़ता दिख रहा है।
क्या था सीजेएम कोर्ट का आदेश
यह पूरा मामला याचिकाकर्ता यामीन की शिकायत से जुड़ा है। यामीन ने अदालत में आरोप लगाया था कि 24 नवंबर को हुई संभल हिंसा के दौरान उनके बेटे आलम को पुलिस ने तीन गोलियां मारीं। इस शिकायत पर सुनवाई करते हुए सीजेएम विभांशु सुधीर ने इसे गंभीर मामला मानते हुए एएसपी अनुज चौधरी, इंस्पेक्टर अनुज तोमर और अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था। अदालत का मानना था कि प्रथम दृष्टया आरोप इतने गंभीर हैं कि उनकी जांच के लिए मुकदमा दर्ज होना जरूरी है।
पुलिस की आपत्ति और हाईकोर्ट में अपील
सीजेएम कोर्ट के आदेश के बाद संभल के एसपी केके विश्नोई ने स्पष्ट किया था कि पुलिस विभाग इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट जाएगा। उनका तर्क था कि संभल हिंसा की पहले ही न्यायिक जांच हो चुकी है और उसी के आधार पर तथ्य सामने आ चुके हैं। पुलिस का कहना है कि जब एक ज्यूडिशियल इंक्वायरी पहले से मौजूद है, तब दोबारा एफआईआर दर्ज करने का आदेश न्यायिक प्रक्रिया की पुनरावृत्ति जैसा है।
ज्यूडिशियल इंक्वायरी बनाम एफआईआर का सवाल
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पहले हुई न्यायिक जांच के बावजूद पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होनी चाहिए। कानून के जानकार मानते हैं कि ज्यूडिशियल इंक्वायरी और आपराधिक मुकदमा दोनों अलग प्रक्रियाएं हैं। एक जांच तथ्यात्मक रिपोर्ट देती है, जबकि एफआईआर के बाद मामला आपराधिक जांच और संभावित ट्रायल की ओर जाता है। यही बिंदु अब हाईकोर्ट में बहस का केंद्र बनने वाला है।
पीड़ित परिवार की उम्मीद और पुलिस की चिंता
यामीन और उनका परिवार इस आदेश को न्याय की पहली सीढ़ी मान रहे हैं। उनका कहना है कि अगर पुलिस कार्रवाई की निष्पक्ष जांच नहीं होगी तो आम नागरिक का भरोसा व्यवस्था से उठ जाएगा। वहीं पुलिस अधिकारियों की चिंता यह है कि ड्यूटी के दौरान लिए गए फैसलों को बाद में आपराधिक नजरिये से देखा जाना पुलिस के मनोबल पर असर डाल सकता है।
अब निगाहें इलाहाबाद हाईकोर्ट पर टिकी हैं। हाईकोर्ट यह तय करेगा कि सीजेएम कोर्ट का आदेश बरकरार रहेगा या उस पर रोक लगेगी। यह फैसला सिर्फ संभल हिंसा मामले तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में पुलिस कार्रवाई और न्यायिक हस्तक्षेप के संतुलन को लेकर एक अहम मिसाल भी बन सकता है।
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