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यूजीसी नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक: शिक्षा, न्याय और नीयत पर उठे बड़े सवाल

देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था से जुड़े यूजीसी नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी ने एक बार फिर यह
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देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था से जुड़े यूजीसी नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या नियम सिर्फ कागजों तक सीमित हैं या उनका असर समाज की सोच और दिशा पर भी पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इन नियमों पर रोक लगाते हुए न सिर्फ उनकी भाषा को अस्पष्ट बताया, बल्कि यह भी कहा कि इनका दुरुपयोग संभव है। इस फैसले के बाद राजनीति भी गरमा गई है और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव का बयान चर्चा के केंद्र में है।

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    यूजीसी नियमों पर कोर्ट की सख्त नजर

    मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने साफ कहा कि प्रथम दृष्टया ये नियम स्पष्ट नहीं हैं। अदालत का मानना है कि किसी भी कानून या नियम की सबसे बड़ी ताकत उसकी साफ भाषा और मंशा होती है। अगर नियमों को समझना ही मुश्किल हो तो उनका इस्तेमाल गलत दिशा में भी हो सकता है। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगाते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है और मार्च में इस पर विस्तृत सुनवाई तय की है।

    जातिविहीन समाज की सोच पर बहस

    सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत की टिप्पणी ने इस मुद्दे को सिर्फ शिक्षा तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने सवाल किया कि 75 वर्षों में जातिविहीन समाज की ओर बढ़ते हुए जो कुछ हासिल किया गया है, क्या ये नियम हमें फिर पीछे ले जाने का काम करेंगे। अदालत ने यह भी कहा कि भारत की एकता और सामाजिक समरसता की झलक हमारे शैक्षणिक संस्थानों में दिखनी चाहिए। अगर कैंपस के भीतर भेदभाव या अस्पष्टता होगी, तो उसका असर समाज के बाहर भी दिखेगा।

    अखिलेश यादव का बयान और सियासी संदेश

    सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा कि सच्चा न्याय वही है जिसमें किसी के साथ अन्याय न हो और यही जिम्मेदारी माननीय न्यायालय निभाता है। अखिलेश यादव ने यह भी कहा कि कानून की भाषा और भाव दोनों साफ होने चाहिए, क्योंकि बात सिर्फ नियमों की नहीं, नीयत की भी होती है। उनका यह बयान सीधे तौर पर उस आशंका की ओर इशारा करता है कि अस्पष्ट नियम कहीं न कहीं उत्पीड़न का कारण बन सकते हैं।

    शिक्षा और समाज का आपसी रिश्ता

    सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय, स्कूल और कॉलेज समाज से अलग नहीं होते। वहां बनने वाला माहौल आने वाली पीढ़ी की सोच तय करता है। अगर शिक्षा संस्थानों में नियमों के नाम पर भ्रम या भेदभाव पनपेगा, तो उसका असर पूरे समाज पर पड़ेगा। इसी वजह से अदालत ने प्रभावित लोगों की सुरक्षा के लिए प्रभावी तंत्र की जरूरत पर जोर दिया है।

    फिलहाल यूजीसी नियमों पर रोक ने राहत जरूर दी है, लेकिन असली तस्वीर मार्च में होने वाली सुनवाई के बाद साफ होगी। यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक भी है। अब सबकी नजर इस पर है कि केंद्र सरकार इन सवालों का क्या जवाब देती है और क्या नियमों को ज्यादा स्पष्ट, न्यायपूर्ण और समावेशी बनाया जाएगा।

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