Last updated: January 29th, 2026 at 01:25 pm

29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में यूजीसी के नए नियमों को लेकर हुई सुनवाई सिर्फ एक कानूनी प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि यह भारत की शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक ताने बाने से जुड़े गहरे सवालों पर केंद्रित रही। देशभर में इन नियमों के खिलाफ चल रहे विरोध के बीच अदालत का यह फैसला बेहद अहम माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित यूजीसी के नए नियमों पर फिलहाल रोक लगा दी है और साफ कर दिया है कि 2012 के दिशानिर्देश ही आगे भी लागू रहेंगे।
अदालत की पहली चिंता: नियमों की अस्पष्टता
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इन नए नियमों की भाषा और मंशा पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत का मानना है कि नियमों में स्पष्टता की कमी है और इसी वजह से इनके दुरुपयोग की आशंका भी पैदा होती है। CJI ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि प्रथम दृष्टया ये नियम अस्पष्ट हैं और प्रयुक्त भाषा भी भ्रम पैदा करती है। कोर्ट की यह टिप्पणी इस बात का संकेत है कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में किसी भी तरह की असमंजस भरी नीति खतरनाक साबित हो सकती है।
जातिविहीन समाज की दिशा में पीछे तो नहीं जा रहे
सुनवाई के दौरान सबसे प्रभावशाली टिप्पणी समाजिक संदर्भ में सामने आई। मुख्य न्यायाधीश ने सवाल किया कि 75 वर्षों में भारत ने जातिविहीन समाज की ओर बढ़ने के लिए जो भी हासिल किया है, क्या ये नए नियम उस प्रगति को पीछे की ओर ले जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि देश को आगे बढ़ना चाहिए, न कि पुराने विभाजनों की ओर लौटना चाहिए। साथ ही यह भी जरूरी है कि अगर कोई सामाजिक या संवेदनशील मुद्दा प्रभावित करता है, तो उसके लिए एक मजबूत सुरक्षा तंत्र मौजूद हो।
शैक्षणिक संस्थान समाज से कटे नहीं हो सकते
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि विश्वविद्यालय, कॉलेज और स्कूल समाज से अलग थलग नहीं रह सकते। जो सोच और व्यवहार कैंपस के भीतर पनपता है, उसका असर बाहर भी दिखता है। मुख्य न्यायाधीश ने सवाल उठाया कि अगर शैक्षणिक संस्थानों में विभाजन की स्थिति बनेगी, तो समाज के बाकी हिस्सों में इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत की एकता और विविधता की झलक हमारे शिक्षण संस्थानों में दिखनी चाहिए।
विशेषज्ञ समिति बनाने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि इन नियमों की समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाई जाए। इस समिति में शिक्षाविद, न्यायविद और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोग शामिल हों, ताकि सभी पहलुओं पर संतुलित विचार किया जा सके। अदालत ने कहा कि भाषा को स्पष्ट करने और संभावित सामाजिक प्रभावों को समझने के लिए विशेषज्ञों की राय जरूरी है।
फिलहाल पुराने नियम ही लागू
कोर्ट के आदेश के बाद यूजीसी के नए नियम फिलहाल ठंडे बस्ते में चले गए हैं। जब तक विशेषज्ञ समिति अपनी समीक्षा पूरी नहीं कर लेती और केंद्र सरकार अपना जवाब दाखिल नहीं करती, तब तक 2012 के नियम ही प्रभावी रहेंगे। अब इस मामले की अगली सुनवाई मार्च में होगी, जिस पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं।
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