Last updated: May 22nd, 2026 at 05:52 am

पश्चिम बंगाल में मदरसों में सुबह की प्रार्थना के दौरान “वंदे मातरम” गाने को लेकर नया विवाद शुरू हो गया है। राज्य सरकार के हालिया निर्देश के बाद राजनीतिक और धार्मिक संगठनों की प्रतिक्रियाएं तेज हो गई हैं। इस मुद्दे ने अब बंगाल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है।
सरकार की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि राज्य के सभी मान्यता प्राप्त और सहायता प्राप्त मदरसों में प्रार्थना सभा के दौरान “वंदे मातरम” का गायन किया जाएगा। यह निर्देश अल्पसंख्यक मामलों और मदरसा शिक्षा विभाग से जुड़े संस्थानों पर लागू किया गया है।
इस फैसले का कुछ मुस्लिम संगठनों और नेताओं ने विरोध जताया है। आम जनता उन्नयन पार्टी के अध्यक्ष हुमायूं कबीर ने कहा कि धार्मिक शिक्षण संस्थानों के मामलों में सरकारी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि मदरसों की धार्मिक परंपराओं और व्यवस्थाओं में दखल नहीं होना चाहिए।
कोलकाता खिलाफत कमेटी के प्रतिनिधियों ने भी इस फैसले पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि मुस्लिम समुदाय देशभक्ति में विश्वास रखता है, लेकिन धार्मिक मान्यताओं के कारण कुछ पंक्तियों को लेकर उनकी अलग राय है। उन्होंने सरकार से आदेश पर पुनर्विचार करने की मांग की है।
दूसरी ओर, सरकार का तर्क है कि “वंदे मातरम” राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है। राज्य सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य छात्रों में देश के प्रति सम्मान और एकजुटता की भावना को मजबूत करना है।
इसी बीच हुमायूं कबीर ने खुले में नमाज और पशु कुर्बानी को लेकर भी बयान दिया, जिस पर राजनीतिक विवाद और बढ़ गया है। उनके बयान के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की ओर से तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
फिलहाल यह मुद्दा बंगाल में धर्म, शिक्षा और राजनीति के बीच नए विवाद का कारण बन गया है। आने वाले दिनों में इस मामले को लेकर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।
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