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दिल्ली की सेंट्रल रिज में विलायती कीकर हटाने पर विवाद, हाईकोर्ट की रोक के बाद बढ़ी निगरानी

दिल्ली की सेंट्रल रिज में पर्यावरण संरक्षण और पारिस्थितिक पुनर्स्थापना को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। दिल्ली सरकार के
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दिल्ली की सेंट्रल रिज में पर्यावरण संरक्षण और पारिस्थितिक पुनर्स्थापना को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। दिल्ली सरकार के वन विभाग ने रिज क्षेत्र में तेजी से फैलने वाले विदेशी पेड़ विलायती कीकर को हटाने का काम शुरू किया था, लेकिन अब इस कार्रवाई पर दिल्ली हाईकोर्ट की निगरानी बढ़ गई है। अदालत ने 1 सितंबर को वन विभाग से जवाब मांगा था, जिसके बाद सेंट्रल रिज में चल रहा यह काम फिलहाल रुका हुआ बताया जा रहा है। मामला अब पर्यावरण संरक्षण, वन प्रबंधन और अदालत के पुराने निर्देशों के बीच संतुलन का विषय बन गया है।

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    सेंट्रल रिज को दिल्ली के सबसे महत्वपूर्ण हरित क्षेत्रों में गिना जाता है। यह अरावली पर्वतमाला का हिस्सा है और राजधानी के पर्यावरणीय संतुलन में इसकी अहम भूमिका मानी जाती है। रिज क्षेत्र में पेड़ों और झाड़ियों की मौजूदगी शहर को हरित आवरण देने के साथ-साथ जैव विविधता और स्थानीय पारिस्थितिकी के लिए भी महत्वपूर्ण है। इसी वजह से यहां किसी भी प्रकार की बड़े पैमाने पर कटाई या वनस्पति हटाने की कार्रवाई लंबे समय से संवेदनशील विषय रही है।

    वन विभाग का कहना है कि मौजूदा कार्रवाई किसी निर्माण परियोजना के लिए जंगल साफ करने की कोशिश नहीं है। विभाग के अनुसार यह काम केंद्र से मंजूर दिल्ली Eco-restoration Plan 2026-30 का हिस्सा है। योजना के तहत उन क्षेत्रों में फैले विलायती कीकर को हटाने का प्रस्ताव है जहां इस आक्रामक प्रजाति ने स्थानीय वनस्पतियों के विकास को प्रभावित किया है। इसके बाद अरावली क्षेत्र के लिए उपयुक्त देशी प्रजातियों को लगाया जाना है। सरकार का लक्ष्य आने वाले वर्षों में बड़े स्तर पर देशी पौधों के जरिए रिज की पारिस्थितिकी को दोबारा मजबूत करना है।

    विलायती कीकर यानी Prosopis juliflora तेजी से फैलने वाली विदेशी प्रजाति है। इसके घने फैलाव के कारण कई क्षेत्रों में सूर्य का प्रकाश जमीन तक कम पहुंचता है और स्थानीय पौधों के लिए जगह तथा संसाधनों की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। इसी वजह से पर्यावरणीय पुनर्स्थापना की योजनाओं में इस प्रजाति को नियंत्रित करने पर जोर दिया जाता रहा है। हालांकि विशेषज्ञों के बीच यह भी बहस है कि इसे हटाने का तरीका क्या होना चाहिए और कितनी मात्रा में हटाना पारिस्थितिक रूप से उचित होगा।

    विवाद तब बढ़ा जब सेंट्रल रिज के एक हिस्से में पेड़ों के कटे हुए तने, शाखाओं के ढेर और साफ की गई वनस्पति दिखाई दी। याचिका में आरोप लगाया गया कि कुछ जगहों पर भारी मशीनों का इस्तेमाल किया गया और बड़े पैमाने पर वनस्पति हटाई गई। याचिकाकर्ता ने अदालत के सामने ऐसे फोटो भी रखे जिनमें कथित तौर पर मशीनों और साफ किए गए क्षेत्र दिखाई देते हैं। इन आरोपों के बाद हाईकोर्ट ने वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से जवाब मांगा।

    वन विभाग ने मशीनों से जुड़े आरोपों पर अलग पक्ष रखा है। अधिकारियों के अनुसार 3 सितंबर को दिखाई दिए टायरों के निशान नए जंगल साफ करने के काम के प्रमाण नहीं हैं, बल्कि पानी के टैंकरों के आने-जाने से जुड़े हैं। विभाग ने यह भी कहा कि फिलहाल कोई नई गतिविधि नहीं की जा रही है। इस स्पष्टीकरण के बावजूद अदालत की निगरानी में मामला जारी है और अगली सुनवाई 24 सितंबर को होनी है।

    इस मामले में हाईकोर्ट के पुराने निर्देश भी महत्वपूर्ण हैं। अदालत पहले ही सेंट्रल रिज की प्राकृतिक स्थिति को बनाए रखने पर जोर दे चुकी है। 2023 में अदालत के सामने यह आश्वासन दर्ज हुआ था कि रिज में बिना अनुमति पेड़ों की कटाई या जमीन साफ करने का काम नहीं किया जाएगा। मई 2024 में भी अदालत ने बिना अनुमति पेड़ों की कटाई या झाड़ियों को हटाने पर रोक से जुड़ा निर्देश दिया था। इसलिए वर्तमान कार्रवाई को लेकर यह सवाल उठा है कि पारिस्थितिक पुनर्स्थापना के नाम पर की जा रही गतिविधियां पुराने न्यायिक निर्देशों के अनुरूप हैं या नहीं।

    सरकार के सामने चुनौती यह है कि एक तरफ विलायती कीकर जैसी आक्रामक प्रजातियों को नियंत्रित कर देशी वनस्पतियों को बढ़ावा दिया जाए, वहीं दूसरी तरफ संरक्षित रिज क्षेत्र में किसी भी कार्रवाई से प्राकृतिक पारिस्थितिकी को नुकसान न पहुंचे। आने वाले समय में हाईकोर्ट के सामने वन विभाग की ओर से दिए जाने वाले जवाब से यह स्पष्ट हो सकता है कि पेड़ हटाने की प्रक्रिया किस आधार पर शुरू की गई, किन क्षेत्रों को चुना गया और पुराने न्यायिक निर्देशों का पालन किस तरह सुनिश्चित किया जा रहा है।

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