Last updated: September 5th, 2026 at 02:51 pm

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में करीब 30 आपराधिक मामलों वाले एक व्यक्ति के रहस्यमय तरीके से लापता होने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI को सौंपने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि लापता व्यक्ति के बारे में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि वह जीवित है या उसके साथ कोई गंभीर घटना हुई है। स्थानीय पुलिस की जांच और रिकॉर्ड में सामने आई विसंगतियों को देखते हुए अदालत ने निष्पक्ष जांच के लिए CBI को जिम्मेदारी दी है।
मामला मुजफ्फरनगर के रहने वाले मुत्तलिव से जुड़ा है, जिसे पुलिस रिकॉर्ड में हिस्ट्रीशीटर बताया गया है। उसके खिलाफ जिले के अलग-अलग थानों में करीब 30 आपराधिक मामले दर्ज बताए गए हैं। हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद उसे 4 मई 2026 को जेल से रिहा किया गया था। इसके बाद उसके परिवार ने आरोप लगाया कि रिहाई के तुरंत बाद पुलिस ने मुत्तलिव और उसके पिता शराफत को हिरासत में ले लिया। पिता को कुछ दिनों बाद 7 मई को छोड़ दिया गया, लेकिन मुत्तलिव का तब से कोई पता नहीं चल पाया है।
मुत्तलिव के भाई आलम ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर अपने भाई को अदालत के सामने पेश किए जाने की मांग की थी। याचिका में आरोप लगाया गया कि मुत्तलिव को पुलिस ने हिरासत में लिया था और उसके बाद से वह लापता है। दूसरी ओर पुलिस ने हिरासत में लिए जाने के आरोप से इनकार किया। पुलिस की ओर से यह बताया गया कि वह मुत्तलिव की तलाश कर रही थी ताकि उसके खिलाफ जारी न्यायिक वारंट की तामील कराई जा सके। इस तरह परिवार और पुलिस के दावों में स्पष्ट अंतर सामने आया।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने पुलिस रिकॉर्ड में एक महत्वपूर्ण विसंगति भी सामने आई। अदालत ने एक गैर-जमानती वारंट से जुड़ी प्रविष्टि में तारीख को खरोंचकर बदले जाने का उल्लेख किया। संबंधित थाना प्रभारी ने अपने हलफनामे में माना कि रिकॉर्ड में बदलाव संबंधित कांस्टेबल की गलती और लापरवाही से हुआ था। हालांकि अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि इस कर्मचारी के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई और यह निर्धारित करने के लिए कोई जांच हुई या नहीं कि रिकॉर्ड में बदलाव वास्तव में दुर्घटनावश हुआ था या जानबूझकर।
अदालत ने मामले की परिस्थितियों को गंभीर मानते हुए कहा कि मुत्तलिव के गायब होने की दो संभावनाएं हो सकती हैं। पहली यह कि उसके आपराधिक इतिहास के कारण उसके साथ कोई गंभीर घटना हुई हो और उसके अवशेष कहीं छिपाए गए हों। दूसरी संभावना यह हो सकती है कि वह खुद न्यायिक कार्रवाई से बचने के लिए कहीं छिपा हुआ हो। अदालत के अनुसार दोनों ही स्थितियों में उसके वर्तमान ठिकाने का पता लगाना जरूरी है।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने माना कि स्थानीय पुलिस इस मामले की निष्पक्ष जांच करने की स्थिति में नहीं दिख रही है। अदालत ने जांच की गुणवत्ता और देरी को लेकर भी चिंता व्यक्त की। इसी आधार पर मामले को CBI को सौंपने का फैसला किया गया। CBI को प्रारंभिक रिपोर्ट तीन सप्ताह के भीतर हाईकोर्ट के सामने पेश करने का निर्देश दिया गया है। मुजफ्फरनगर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को भी निर्देश दिया गया है कि जांच के दौरान CBI को जिला प्रशासन और पुलिस की ओर से आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराया जाए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच का उद्देश्य केवल मुत्तलिव को खोज निकालना नहीं है, बल्कि उसके लापता होने की पूरी परिस्थितियों का पता लगाना भी है। यदि वह जीवित है तो उसे खोजकर कानूनी प्रक्रिया के सामने लाना होगा और यदि उसके साथ कोई अपराध हुआ है तो उसके लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान कर कानूनी कार्रवाई करनी होगी।
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