Last updated: September 2nd, 2026 at 02:49 pm
राजधानी दिल्ली में रोजाना सड़कों, घरों और बाजारों से कचरा इकट्ठा करने वाले हजारों अनौपचारिक सफाई कर्मियों को अब केवल कचरा बीनने वाले श्रमिकों के तौर पर नहीं, बल्कि पर्यावरण और जलवायु संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले लोगों के रूप में पहचान मिल रही है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) से जुड़े ‘प्रोजेक्ट उत्थान’ के तहत देशभर में 42 हजार से अधिक कचरा श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा, सरकारी योजनाओं और आर्थिक सेवाओं से जोड़ने का काम किया गया है।
प्रोजेक्ट उत्थान की शुरुआत में इन श्रमिकों को आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा से जोड़ने पर जोर दिया गया। कई श्रमिकों के लिए बैंक खाता खुलवाना, बचत की आदत विकसित करना और बीमा जैसी सुविधाओं तक पहुंच बनाना उनके जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव साबित हुआ। परियोजना से जुड़े श्रमिकों को सरकारी योजनाओं और जरूरी दस्तावेजों के बारे में जानकारी भी दी गई, जिससे वे उन सुविधाओं का लाभ उठा सकें जिनके वे पात्र हैं।
दिल्ली के कचरा श्रमिकों के लिए यह बदलाव केवल आर्थिक मदद तक सीमित नहीं है। UNDP के मुताबिक, ये श्रमिक शहरों की ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे रोजाना बड़ी मात्रा में कचरे को इकट्ठा करके उसे अलग-अलग श्रेणियों में बांटते हैं, जिससे प्लास्टिक, कपड़े, बोतल और दूसरी पुनर्चक्रण योग्य वस्तुओं को दोबारा इस्तेमाल करने का रास्ता मिलता है। इस तरह उनका काम सीधे तौर पर कचरे को कम करने और संसाधनों के पुन: उपयोग में योगदान देता है।
प्रोजेक्ट से जुड़े कई श्रमिकों ने बताया कि पहले उनकी आमदनी और भविष्य दोनों अस्थिर थे। दिल्ली के 48 वर्षीय कचरा श्रमिक जोगिंदर केवट ने बताया कि पहले उनकी कमाई का लगभग पूरा हिस्सा तत्काल घरेलू जरूरतों में खर्च हो जाता था। परियोजना से जुड़ने के बाद उन्हें बचत करने और बच्चों की शिक्षा तथा घरेलू खर्चों को बेहतर तरीके से संभालने में मदद मिली। उनके अनुसार सरकारी योजनाओं और उपलब्ध सहायता की जानकारी मिलने से भी परिवार की स्थिति में सुधार आया।
इसी तरह परियोजना से जुड़ी अन्य महिला श्रमिकों ने भी सरकारी दस्तावेज और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं तक पहुंच बनने को महत्वपूर्ण बदलाव बताया। कुछ श्रमिकों को ई-श्रम कार्ड, आयुष्मान कार्ड और अन्य सरकारी लाभों से जोड़ने में सहायता मिली। इससे उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं और दूसरी सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाने में आसानी हुई।
इस पहल का एक दिलचस्प पहलू कचरे के पुनर्चक्रण से जुड़े छोटे स्तर के व्यवसाय भी हैं। परियोजना के एक अपसाइक्लिंग केंद्र में इस्तेमाल हो चुके दूध के प्लास्टिक पाउच को साफ करके उनसे लंबी प्लास्टिक पट्टियां बनाई जाती हैं। इन पट्टियों को कपास के धागे के साथ बुनकर बैग, वॉलेट और पौधों के लिए हैंगर जैसी उपयोगी वस्तुएं तैयार की जाती हैं। यानी जिस सामग्री को पहले बेकार समझकर फेंक दिया जाता था, उसे दोबारा बाजार में उपयोगी उत्पाद के रूप में लाया जा रहा है।
UNDP का कहना है कि इस पहल में केवल सरकारी योजनाओं तक पहुंच बनाना ही लक्ष्य नहीं है। इसका उद्देश्य कचरा श्रमिकों की सामाजिक पहचान को भी बदलना है। उन्हें ऐसे नागरिकों के रूप में पहचान दिलाने की कोशिश की जा रही है जिनके अधिकार, जरूरतें और आकांक्षाएं हैं और जो शहरों को साफ रखने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान देते हैं। UNDP इंडिया के अधिकारियों के मुताबिक, जब एक व्यक्ति किसी सरकारी योजना का लाभ हासिल करता है तो उसके आसपास के दूसरे लोग भी उससे प्रेरित होकर योजनाओं से जुड़ने लगते हैं।
दिल्ली के हजारों कचरा श्रमिकों को ‘क्लाइमेट चैंपियन’ के रूप में पहचान मिलना शहर की सफाई व्यवस्था से आगे बढ़कर सामाजिक सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव है। UNDP समर्थित प्रोजेक्ट उत्थान के जरिए 42 हजार से अधिक श्रमिकों को सरकारी योजनाओं, वित्तीय सुरक्षा और बेहतर आजीविका से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
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