Last updated: July 30th, 2026 at 05:41 pm

नई दिल्ली में रेहड़ी-पटरी और स्ट्रीट वेंडर्स से जुड़ी व्यवस्था को लेकर प्रशासनिक गतिविधियां चर्चा में हैं। राजधानी के विभिन्न इलाकों में सड़क किनारे कारोबार करने वाले छोटे दुकानदारों और वेंडर्स की व्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए स्थानीय प्रशासन और संबंधित एजेंसियों की ओर से नियमों के पालन पर जोर दिया जा रहा है। इस प्रक्रिया का सीधा संबंध हजारों छोटे कारोबारियों की आजीविका और सार्वजनिक स्थानों के प्रबंधन से है।
दिल्ली में स्ट्रीट वेंडिंग लंबे समय से शहरी अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। सड़क किनारे फल-सब्जी बेचने वाले, चाय-नाश्ते की दुकान चलाने वाले, कपड़े और अन्य छोटे सामान बेचने वाले लोग बड़ी संख्या में इस व्यवसाय पर निर्भर हैं। कम पूंजी में कारोबार शुरू करने की सुविधा के कारण कई परिवारों के लिए स्ट्रीट वेंडिंग आजीविका का प्रमुख साधन है।
वहीं, अनियंत्रित स्ट्रीट वेंडिंग के कारण कई इलाकों में यातायात, पैदल चलने वालों और सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल को लेकर समस्याएं भी सामने आती हैं। फुटपाथों और सड़कों पर अनधिकृत तरीके से दुकानें लगने से पैदल यात्रियों को मुख्य सड़क पर चलना पड़ सकता है। इससे यातायात प्रभावित होने के साथ दुर्घटना का खतरा भी बढ़ सकता है।
प्रशासन की कोशिश रहती है कि स्ट्रीट वेंडर्स के लिए निर्धारित वेंडिंग जोन बनाए जाएं और कारोबार को व्यवस्थित तरीके से संचालित किया जाए। इसके लिए वेंडर्स की पहचान, लाइसेंस और स्थान आवंटन जैसी प्रक्रियाएं महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इससे एक ओर छोटे कारोबारियों की आजीविका सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है, वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक स्थानों पर अव्यवस्था को कम किया जा सकता है।
दिल्ली में स्ट्रीट वेंडिंग से जुड़े नियमों को लागू करने की प्रक्रिया कई बार विवाद का विषय भी बनती रही है। वेंडर्स का कहना है कि उन्हें उचित स्थान और नियमित कारोबार की सुविधा मिलनी चाहिए, जबकि प्रशासन का जोर यातायात और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने पर रहता है। ऐसे में दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाना प्रशासन के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान अनधिकृत तरीके से लगाए गए ठेले और दुकानों को हटाया जा सकता है। हालांकि, ऐसी कार्रवाई के बाद वेंडर्स के सामने आजीविका का संकट भी पैदा हो सकता है। इसलिए स्थायी समाधान के लिए वेंडिंग जोन और लाइसेंस व्यवस्था को प्रभावी तरीके से लागू करना जरूरी माना जाता है।
स्ट्रीट वेंडिंग व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए टाउन वेंडिंग कमेटियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। ऐसी समितियों के माध्यम से वेंडर्स की पहचान, वेंडिंग जोन और अन्य संबंधित मामलों पर निर्णय लेने का प्रयास किया जाता है। इससे स्थानीय प्रशासन और स्ट्रीट वेंडर्स के बीच समन्वय स्थापित करने में मदद मिल सकती है।
राजधानी में स्ट्रीट वेंडिंग व्यवस्था का असर स्थानीय बाजारों और उपभोक्ताओं पर भी पड़ता है। सड़क किनारे छोटे दुकानदार आम लोगों को कई तरह की वस्तुएं और सेवाएं कम कीमत पर उपलब्ध कराते हैं। इसके अलावा, ये छोटे कारोबारी स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी योगदान देते हैं।
प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि स्ट्रीट वेंडर्स को उनकी आजीविका का अधिकार मिले, लेकिन साथ ही सार्वजनिक स्थानों और यातायात व्यवस्था पर भी प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। इसके लिए स्पष्ट नियम, पारदर्शी लाइसेंस प्रक्रिया और पर्याप्त वेंडिंग जोन की आवश्यकता होती है।
वेंडर्स के लिए भी जरूरी है कि वे निर्धारित नियमों का पालन करें और आवंटित स्थानों पर ही कारोबार करें। इससे प्रशासन के साथ विवाद की स्थिति कम हो सकती है और सार्वजनिक स्थानों का बेहतर प्रबंधन किया जा सकता है।
दिल्ली में स्ट्रीट वेंडिंग और रेहड़ी-पटरी कारोबारियों से जुड़ी प्रशासनिक गतिविधियां चर्चा में बनी हुई हैं। आने वाले समय में वेंडिंग जोन, लाइसेंस और स्थानीय बाजारों के प्रबंधन को लेकर और फैसले लिए जा सकते हैं। यदि प्रशासन और वेंडर्स के बीच बेहतर समन्वय स्थापित होता है, तो राजधानी में छोटे कारोबारियों की आजीविका और शहरी व्यवस्था दोनों को संतुलित तरीके से आगे बढ़ाया जा सकता है।
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