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बिहार के 76 हजार से अधिक सरकारी स्कूलों को ₹372 करोड़ की कंपोजिट ग्रांट, मरम्मत और बुनियादी सुविधाओं पर खर्च होगी राशि

  बिहार के सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति सुधारने के लिए राज्य सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। प्रदेश के
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    बिहार के सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति सुधारने के लिए राज्य सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। प्रदेश के 76 हजार से अधिक सरकारी विद्यालयों में भवनों की मरम्मत, पेयजल, शौचालय, बिजली और साफ-सफाई जैसी बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए लगभग 372.24 करोड़ रुपये की कंपोजिट स्कूल ग्रांट स्वीकृत की गई है। शिक्षा विभाग की इस पहल का उद्देश्य स्कूलों को स्थानीय जरूरतों के अनुसार जरूरी काम कराने के लिए वित्तीय सुविधा उपलब्ध कराना है। इससे छोटी-मोटी मरम्मत के लिए विद्यालयों को विभागीय मुख्यालय की अनुमति और लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

     

    यह राशि राज्य सरकार के ‘सेवा संकल्प एवं कायाकल्प अभियान’ के तहत उपलब्ध कराई जा रही है। इस अभियान के माध्यम से सरकारी विद्यालयों की आधारभूत संरचना को मजबूत करने और विद्यार्थियों के लिए बेहतर शैक्षणिक वातावरण तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है। शिक्षा विभाग ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए समग्र शिक्षा के अंतर्गत कंपोजिट स्कूल ग्रांट की राशि स्वीकृत की है।

     

    आवंटन के अनुसार, राज्य के 66,799 प्रारंभिक विद्यालयों के लिए लगभग 305.43 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं। वहीं, 9,312 माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों के लिए 66.81 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत हुई है। इस तरह कुल 76,111 सरकारी विद्यालयों को इस योजना का लाभ मिलेगा। विद्यालयों में नामांकन और निर्धारित मानकों के आधार पर राशि का आवंटन किया गया है।

     

    इस अनुदान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि स्कूलों को अपनी स्थानीय जरूरतों के अनुसार खर्च की प्राथमिकता तय करने की सुविधा मिलेगी। अब किसी विद्यालय में पेयजल की व्यवस्था खराब है तो वहां पहले चापाकल या पानी की सुविधा ठीक कराई जा सकेगी। किसी दूसरे स्कूल में शौचालय की मरम्मत, कक्षा-कक्षों के रखरखाव या भवन की मरम्मत की आवश्यकता है तो उपलब्ध राशि का उपयोग उस काम के लिए किया जा सकेगा।

     

    कंपोजिट ग्रांट से विद्यालय भवनों और कक्षा-कक्षों की छोटी-मोटी मरम्मत, रंग-रोगन, दरवाजे-खिड़कियों की मरम्मत और किचन शेड के रखरखाव जैसे कार्य कराए जा सकेंगे। इसके अलावा शौचालयों की साफ-सफाई, पेयजल व्यवस्था को दुरुस्त करने, बिजली से जुड़ी समस्याओं को दूर करने और स्कूल परिसर की स्वच्छता पर भी राशि खर्च की जा सकती है। शिक्षण गतिविधियों को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए जरूरी आवर्ती खर्चों को पूरा करने में भी यह अनुदान उपयोगी होगा।

     

    अब तक कई सरकारी विद्यालयों में छोटी समस्याओं को दूर कराने के लिए प्रधानाध्यापकों को प्रखंड और जिला स्तर के कार्यालयों में प्रस्ताव भेजना पड़ता था। स्वीकृति और बजट मिलने में देरी होने के कारण कई जरूरी काम लंबे समय तक लंबित रह जाते थे। कई जगह शौचालयों की मरम्मत, पानी की व्यवस्था और कक्षाओं के रखरखाव जैसी समस्याएं विद्यार्थियों की पढ़ाई को प्रभावित करती थीं। नई व्यवस्था से विद्यालय स्तर पर इन समस्याओं का समाधान अपेक्षाकृत तेजी से होने की उम्मीद है।

     

    शिक्षा विभाग ने जिला शिक्षा पदाधिकारियों को निर्देश दिया है कि अनुदान का उपयोग निर्धारित समयसीमा के भीतर और विद्यालयों की वास्तविक जरूरतों के आधार पर सुनिश्चित किया जाए। विद्यालय प्रबंधन समितियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। उन्हें स्थानीय स्तर पर आवश्यक कार्यों की पहचान कर प्राथमिकता तय करनी होगी। खर्च की जानकारी और कार्यों का विवरण निर्धारित व्यवस्था के तहत कायाकल्प पोर्टल पर दर्ज किया जाएगा, ताकि अनुदान के उपयोग की निगरानी की जा सके।

     

    जिलावार आवंटन में गया को सबसे अधिक राशि मिली है। जिले के 3,067 प्रारंभिक विद्यालयों के लिए 13.48 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। इसके बाद पूर्वी चंपारण और मुजफ्फरपुर का स्थान है, जहां प्रारंभिक विद्यालयों के लिए क्रमशः लगभग 14.99 करोड़ और 14.19 करोड़ रुपये का आवंटन बताया गया है। दूसरी ओर, शेखपुरा और शिवहर को अपेक्षाकृत कम राशि मिली है। यह आवंटन विद्यालयों की संख्या और संबंधित मानकों के आधार पर किया गया है।

     

    सरकार का लक्ष्य केवल विद्यालयों की इमारतों की मरम्मत करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को स्वच्छ, सुरक्षित और सुविधायुक्त वातावरण उपलब्ध कराना है। बेहतर पेयजल, साफ शौचालय, बिजली और व्यवस्थित कक्षाएं सीधे तौर पर बच्चों की उपस्थिति तथा पढ़ाई के माहौल को प्रभावित करती हैं।

     

    इस योजना की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि स्वीकृत राशि का उपयोग समय पर और पारदर्शी तरीके से किया जाता है या नहीं। यदि विद्यालयों में जरूरत के अनुसार काम पूरे होते हैं और उनकी नियमित निगरानी होती है तो राज्य के हजारों सरकारी स्कूलों की स्थिति में सुधार आ सकता है। अब शिक्षा विभाग के सामने चुनौती है कि 372 करोड़ रुपये के इस अनुदान का लाभ विद्यार्थियों तक जमीन पर दिखाई दे।

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