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बिहार नक्सल-मुक्त घोषित, मुंगेर में आखिरी सक्रिय सशस्त्र माओवादी सुरेश कोड़ा ने किया आत्मसमर्पण

  बिहार में दशकों से चली आ रही नक्सली गतिविधियों के खिलाफ अभियान को एक बड़ी सफलता मिली, जब माओवादी
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    बिहार में दशकों से चली आ रही नक्सली गतिविधियों के खिलाफ अभियान को एक बड़ी सफलता मिली, जब माओवादी कमांडर सुरेश कोड़ा उर्फ मुस्तकीम ने 18 फरवरी 2026 को मुंगेर में बिहार पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इसके अगले दिन, 19 फरवरी को पुलिस अधिकारियों ने घोषणा की कि राज्य के पूर्व में नक्सल प्रभावित रहे 23 जिलों में अब कोई सक्रिय सशस्त्र माओवादी दस्ता मौजूद नहीं है। पुलिस ने सुरेश कोड़ा को बिहार का आखिरी सक्रिय हथियारबंद माओवादी कमांडर बताया। इस घटनाक्रम को राज्य में वामपंथी उग्रवाद के खिलाफ लंबे समय से चल रहे अभियान की महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

     

    सुरेश कोड़ा ने मुंगेर में बिहार पुलिस की विशेष कार्यबल (STF) और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के सामने आत्मसमर्पण किया। वह मुंगेर जिले के लड़ैयाटांड थाना क्षेत्र के पैसरा गांव का रहने वाला है। पुलिस के अनुसार, वह पिछले करीब 25 वर्षों से फरार था और प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के विशेष क्षेत्रीय कमेटी से जुड़ा हुआ था। उसके सिर पर तीन लाख रुपये का इनाम घोषित था। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, मुंगेर, लखीसराय और जमुई सहित विभिन्न जिलों में उसके खिलाफ लगभग 60 मामले दर्ज थे।

     

    आत्मसमर्पण के दौरान सुरेश कोड़ा ने सुरक्षा बलों को कई हथियार और भारी मात्रा में गोला-बारूद सौंपा। पुलिस के अनुसार, इनमें दो इंसास राइफल, एक AK-47, एक AK-56, 505 कारतूस और 10 मैगजीन शामिल थीं। बिहार पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि इनमें कुछ हथियार ऐसे भी थे, जो पहले सुरक्षा बलों से लूटे गए थे। पुलिस का दावा है कि कोड़ा लंबे समय से माओवादी संगठन की गतिविधियों में सक्रिय था और कई हिंसक घटनाओं में उसकी कथित भूमिका रही थी।

     

    बिहार पुलिस मुख्यालय में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ऑपरेशन और STF के महानिदेशक कुंदन कृष्णन ने इस आत्मसमर्पण को राज्य में संगठित माओवादी गतिविधियों के अंत की दिशा में बड़ा कदम बताया। उन्होंने कहा कि लगातार चलाए गए सुरक्षा अभियानों और माओवादी दस्तों पर बढ़ते दबाव के कारण संगठन की सक्रियता समाप्त हुई है। मुंगेर रेंज के पुलिस उपमहानिरीक्षक राकेश कुमार ने भी कहा कि पहले नक्सल प्रभावित रहे 23 जिलों में अब कोई सशस्त्र नक्सली दस्ता सक्रिय नहीं है।

     

    पुलिस अधिकारियों के अनुसार, सुरेश कोड़ा के खिलाफ कार्रवाई केवल सैन्य और पुलिस अभियानों का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसमें सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस नीति के तहत हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटने वाले माओवादियों को आर्थिक सहायता, प्रशिक्षण और पुनर्वास से जुड़े लाभ दिए जाते हैं। अधिकारियों के मुताबिक, सुरेश कोड़ा को घोषित तीन लाख रुपये के इनाम के अलावा पुनर्वास प्रोत्साहन राशि, 36 महीने तक कौशल प्रशिक्षण के लिए आर्थिक सहायता और हथियारों के आत्मसमर्पण से संबंधित निर्धारित लाभ दिए जाने का प्रावधान है।

     

    बिहार में नक्सलवाद का प्रभाव कई दशकों तक बना रहा। विशेष रूप से मध्य बिहार और दक्षिणी जिलों के ग्रामीण एवं जंगलों से जुड़े इलाकों में माओवादी गतिविधियां सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती थीं। मुंगेर, जमुई, लखीसराय, गया, औरंगाबाद और नवादा जैसे क्षेत्रों में समय-समय पर सुरक्षा बलों पर हमले, अपहरण, रंगदारी और हिंसक घटनाएं सामने आती रही थीं। वर्ष 2012 में राज्य के 23 जिले नक्सल प्रभावित माने जाते थे। इन इलाकों में पुलिस और अर्धसैनिक बलों को लंबे समय तक अभियान चलाना पड़ा।

     

    पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में बिहार में 220 माओवादियों को गिरफ्तार किया गया था। इसी दौरान सुरक्षा बलों ने हथियार, कारतूस, विस्फोटक सामग्री और अन्य आपत्तिजनक सामान भी बरामद किए। अधिकारियों ने दावा किया कि लगातार कार्रवाई के कारण माओवादी संगठनों की संगठनात्मक और हथियारबंद क्षमता कमजोर हुई। ग्रामीण इलाकों में प्रशासनिक पहुंच बढ़ाने और विकास योजनाओं को लागू करने को भी इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण कारण बताया गया।

     

    हालांकि, बिहार को नक्सल-मुक्त घोषित किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि सुरक्षा एजेंसियों की जिम्मेदारी समाप्त हो गई है। अधिकारियों के सामने अब भी यह चुनौती है कि प्रतिबंधित संगठनों के बचे हुए नेटवर्क को दोबारा सक्रिय होने से रोका जाए और प्रभावित क्षेत्रों में शांति बनाए रखी जाए। इसके लिए पुलिस निगरानी, स्थानीय लोगों का सहयोग, सड़क और संचार सुविधाओं का विस्तार तथा रोजगार के अवसर बढ़ाना जरूरी होगा।

     

    मुंगेर में सुरेश कोड़ा का आत्मसमर्पण बिहार के सुरक्षा इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यदि राज्य सरकार और सुरक्षा एजेंसियां लगातार निगरानी के साथ प्रभावित इलाकों में विकास और पुनर्वास पर ध्यान देती हैं, तो लंबे समय से हिंसा झेल रहे क्षेत्रों में स्थायी शांति स्थापित करने की दिशा में मदद मिल सकती है।

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