Last updated: August 20th, 2026 at 03:07 pm

उत्तर प्रदेश में नकली और अवैध तरीके से रखी गई दवाओं के खिलाफ चल रही कार्रवाई में एक बड़े नेटवर्क का खुलासा हुआ है। राज्य के खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन की जांच में पिछले आठ महीनों के दौरान करीब ₹4.5 करोड़ मूल्य की संदिग्ध और अवैध दवाएं जब्त की गई हैं। जांच का दायरा लखनऊ, आगरा, वाराणसी और गोंडा तक पहुंच चुका है और इस पूरे मामले में राजस्थान तथा उत्तराखंड से भी कनेक्शन सामने आया है। मामले में अब तक 16 FIR दर्ज की जा चुकी हैं और 33 फर्मों से जुड़े 73 लोगों की भूमिका जांच के दायरे में है।
जांच अधिकारियों के मुताबिक, यह मामला केवल नकली दवाओं की बिक्री तक सीमित नहीं है। सामने आए नेटवर्क में कथित तौर पर दवाओं की खरीद-बिक्री के फर्जी रिकॉर्ड, नकली बिल, क्रॉस-बिलिंग, कंप्यूटर रिकॉर्ड में हेरफेर और अवैध गोदामों का इस्तेमाल किया जा रहा था। जांच एजेंसियां अब इस बात का पता लगाने में जुटी हैं कि नकली दवाओं का निर्माण कहां किया जाता था और उन्हें बाजार तक पहुंचाने में किन लोगों की भूमिका थी।
लखनऊ में हुई जांच के दौरान अमीनाबाद, कैसरबाग और बख्शी का तालाब जैसे इलाकों में दवा कारोबार से जुड़े कई ठिकानों की जांच की गई। अधिकारियों को कुछ मामलों में रिकॉर्ड में दर्ज दवाओं की खरीद और बिक्री तथा वास्तविक स्टॉक के बीच अंतर मिला। इससे संदेह गहरा हुआ कि कागजों पर बड़ी मात्रा में दवाओं का कारोबार दिखाकर वास्तविक सप्लाई के बिना ही बिल तैयार किए जा रहे थे।
एक मामले में दवा कारोबार से जुड़े रिकॉर्ड में करीब ₹8.87 करोड़ की संदिग्ध बिलिंग सामने आई। जांच के दौरान कुछ दवाओं के स्रोत का सत्यापन नहीं हो सका। अधिकारियों ने यह भी पाया कि कुछ कंप्यूटर रिकॉर्ड में बदलाव किए गए थे। इस तरह के दस्तावेजी लेनदेन का इस्तेमाल कथित तौर पर असली दवाओं की सप्लाई का भ्रम पैदा करने के लिए किया जा रहा था।
लखनऊ में एक अन्य कार्रवाई के दौरान एक कथित अवैध गोदाम से करीब ₹21 लाख की दवाएं बरामद की गईं। इनमें कुछ ऐसी दवाएं भी शामिल थीं जिनके नकली होने की आशंका जताई गई है। अधिकारियों ने दवाओं को जब्त करने के साथ उनके स्रोत और सप्लाई चेन की जांच शुरू कर दी है।
जांच का दायरा उत्तराखंड तक भी पहुंचा। एक कथित अवैध निर्माण इकाई पर कार्रवाई के दौरान दवाओं की पैकिंग में इस्तेमाल होने वाली मशीनें, ब्लिस्टर पैकिंग उपकरण, फार्मास्युटिकल फॉयल और अन्य सामग्री बरामद की गई। वहां से करीब ₹2 करोड़ मूल्य की संदिग्ध दवाएं और संबंधित सामग्री जब्त किए जाने की जानकारी सामने आई है। इस मामले में दो लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई है।
आगरा भी इस जांच में एक महत्वपूर्ण केंद्र बनकर सामने आया है। वहां अलग-अलग कार्रवाई में करीब ₹3.7 करोड़ की संदिग्ध दवाएं जब्त की गईं। अधिकारियों को कथित तौर पर नकली लेबल, गलत तरीके से बढ़ाए गए MRP और फर्जी बिलिंग से जुड़े रिकॉर्ड मिले। आगरा में भी कई FIR दर्ज की गई हैं और कई लोगों की भूमिका की जांच जारी है।
गोंडा में तीन कथित अवैध गोदामों पर कार्रवाई के दौरान करीब ₹1.13 करोड़ की दवाएं बरामद की गईं। वहीं वाराणसी में बिना लाइसेंस वाले भंडारण केंद्र से लगभग ₹25 लाख की दवाएं मिलने की जानकारी सामने आई है। इससे संकेत मिलता है कि यह नेटवर्क अलग-अलग जिलों में कई स्तरों पर सक्रिय हो सकता है।
इस पूरे मामले की सबसे गंभीर चिंता मरीजों की सुरक्षा को लेकर है। नकली या घटिया दवाओं के इस्तेमाल से बीमारी का सही इलाज नहीं हो सकता और कुछ परिस्थितियों में मरीज की स्थिति और गंभीर हो सकती है। विशेष रूप से गंभीर बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की गुणवत्ता से किसी भी तरह का समझौता बेहद खतरनाक हो सकता है।
जांच एजेंसियां अब कथित नेटवर्क में शामिल निर्माताओं, सप्लायरों, फाइनेंसरों, परिवहनकर्ताओं और वितरकों की पहचान करने में जुटी हैं। इसके लिए दवा खरीद-बिक्री के दस्तावेज, बैंकिंग रिकॉर्ड, कंप्यूटर डेटा और जब्त सामग्री की जांच की जा रही है।
अधिकारियों ने संकेत दिया है कि नकली दवाओं के खिलाफ कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी। फिलहाल सामने आए मामलों की जांच बढ़ने के साथ इस नेटवर्क से जुड़े और लोगों के नाम सामने आने की संभावना है। उत्तर प्रदेश में हुई यह कार्रवाई दवा बाजार में निगरानी और मरीजों तक पहुंचने वाली दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
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