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UP Politics: ब्राह्मण वोटरों पर बढ़ा सियासी फोकस, चुनाव से पहले सभी दलों की नजर इस अहम वर्ग पर

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति में विधानसभा चुनाव से पहले ब्राह्मण मतदाताओं को साधने की कोशिशें तेज हो गई हैं।
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लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति में विधानसभा चुनाव से पहले ब्राह्मण मतदाताओं को साधने की कोशिशें तेज हो गई हैं। समाजवादी पार्टी ने जनेश्वर मिश्र की जयंती के अवसर पर बड़े स्तर पर कार्यक्रम आयोजित कर ब्राह्मण समाज को अपने साथ जोड़ने का संदेश देने की कोशिश की है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पहल आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए पार्टी की रणनीति का हिस्सा है।

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    ब्राह्मण वोट बैंक पर सभी दलों की नजर

    उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण मतदाता लंबे समय से प्रभावशाली भूमिका निभाते रहे हैं। यही वजह है कि भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी जैसे प्रमुख दल इस वर्ग का समर्थन हासिल करने के लिए लगातार प्रयास करते रहे हैं। चुनावी समीकरणों में इस समुदाय को निर्णायक माना जाता है।

    सपा की नई रणनीति

    समाजवादी पार्टी का मानना है कि केवल अपने पारंपरिक सामाजिक समीकरणों के सहारे सत्ता तक पहुंचना आसान नहीं होगा। इसी कारण पार्टी अब पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (PDA) समीकरण के साथ-साथ सवर्ण, विशेषकर ब्राह्मण मतदाताओं को भी जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। इसी उद्देश्य से जनेश्वर मिश्र जयंती कार्यक्रम को इस बार विशेष रूप से बड़े स्तर पर आयोजित किया गया।

    क्या कहते हैं चुनावी आंकड़े?

    राजनीतिक आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश की कुल आबादी में ब्राह्मण मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 10 प्रतिशत मानी जाती है। इनकी सबसे अधिक उपस्थिति पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश के कई जिलों में है। पिछले विधानसभा चुनावों में इस वर्ग का बड़ा हिस्सा भाजपा के पक्ष में गया था, जबकि अन्य दलों को सीमित समर्थन मिला था।

    सोशल इंजीनियरिंग फिर बनी चर्चा का विषय

    राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में सोशल इंजीनियरिंग हमेशा चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा रही है। वर्ष 2007 में बहुजन समाज पार्टी ने इसी रणनीति के जरिए सत्ता हासिल की थी। अब समाजवादी पार्टी भी सामाजिक समीकरणों का विस्तार कर नए मतदाताओं को जोड़ने की कोशिश कर रही है।

    चुनाव से पहले बढ़ेगी सियासी सक्रियता

    आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए प्रदेश में अलग-अलग सामाजिक वर्गों को साधने की राजनीतिक कवायद और तेज होने की संभावना है। ऐसे में ब्राह्मण मतदाताओं को लेकर सभी प्रमुख दलों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा आने वाले समय में और बढ़ सकती है।

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