Last updated: August 12th, 2026 at 12:42 pm

दिल्ली-एनसीआर की अरावली पहाड़ियों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने सरकार की ओर से कराई गई public feedback प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि लोगों को अपनी आपत्तियां और सुझाव देने के लिए दिया गया समय पर्याप्त नहीं था और पूरी प्रक्रिया जल्दबाजी में पूरी की गई।
अरावली क्षेत्र दिल्ली-एनसीआर के पर्यावरण के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पहाड़ी श्रृंखला हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों तक फैली हुई है और प्राकृतिक ecosystem के साथ-साथ groundwater recharge और biodiversity के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
सरकार की ओर से प्रस्तावित बदलावों को लेकर लोगों और पर्यावरण समूहों से feedback मांगा गया था। इसके लिए 21 दिनों की अवधि निर्धारित की गई थी। प्रक्रिया पूरी होने के बाद कई activists ने इसे लेकर आपत्ति जताई।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि इतने महत्वपूर्ण और बड़े भौगोलिक क्षेत्र से जुड़े विषय पर जनता को विस्तृत documents समझने और अपनी आपत्तियां दर्ज कराने के लिए ज्यादा समय मिलना चाहिए था।
उनका तर्क है कि अरावली से जुड़े किसी भी निर्णय का प्रभाव केवल जंगल या पहाड़ियों तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर groundwater, हवा की गुणवत्ता, wildlife और आसपास रहने वाली आबादी पर भी पड़ सकता है।
कार्यकर्ताओं ने consultation process को और व्यापक बनाने तथा deadline बढ़ाने की मांग की है। उनका कहना है कि स्थानीय लोगों, environmental experts और civil-society organisations को भी पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए।
अरावली क्षेत्र दिल्ली और आसपास के इलाकों के लिए एक प्राकृतिक ecological barrier की तरह काम करता है। यह क्षेत्र desertification को रोकने, धूल के फैलाव को कम करने और स्थानीय पर्यावरण को संतुलित रखने में भूमिका निभाता है।
पर्यावरणविदों का कहना है कि अरावली में बड़े पैमाने पर construction या mining जैसी गतिविधियों से प्राकृतिक ecosystem को नुकसान पहुंच सकता है। इसलिए किसी भी policy या land classification में बदलाव से पहले विस्तृत environmental assessment जरूरी है।
दूसरी ओर विकास समर्थक पक्ष का तर्क है कि दिल्ली-एनसीआर में infrastructure और urban development की जरूरतों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकार के सामने विकास और environmental protection के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है।
Public feedback प्रक्रिया इसी संतुलन को ध्यान में रखते हुए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। लोगों से प्राप्त सुझावों के आधार पर सरकार आगे की नीति और implementation framework में बदलाव कर सकती है।
Activists का कहना है कि consultation केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए। यदि किसी बड़े environmental decision पर जनता की राय मांगी जाती है तो लोगों को पर्याप्त समय, स्पष्ट maps और detailed documents उपलब्ध कराए जाने चाहिए।
अरावली विवाद का असर दिल्ली के अलावा गुरुग्राम, फरीदाबाद और राजस्थान के कुछ हिस्सों पर भी पड़ सकता है, क्योंकि पूरी अरावली श्रृंखला कई राज्यों में फैली हुई है।
इस विषय पर social media और environmental groups में भी चर्चा बढ़ी है। कई लोगों ने सरकार से पारदर्शिता और वैज्ञानिक आधार पर निर्णय लेने की मांग की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अरावली जैसे ecologically sensitive क्षेत्र के मामले में long-term impact assessment बेहद जरूरी है। किसी भी निर्णय के तत्काल आर्थिक लाभ के साथ उसके दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभावों का भी अध्ययन किया जाना चाहिए।
फिलहाल activists की मुख्य मांग है कि public consultation को पर्याप्त समय दिया जाए और सभी stakeholders को अपनी राय रखने का अवसर मिले।
कुल मिलाकर, अरावली से जुड़े प्रस्ताव ने दिल्ली-एनसीआर में विकास बनाम पर्यावरण संरक्षण की पुरानी बहस को फिर सामने ला दिया है। आने वाले समय में सरकार की ओर से feedback पर क्या कार्रवाई की जाती है, यह इस विवाद की अगली दिशा तय करेगा।
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