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बिहार में बिजली की मांग 9.5 गीगावाट तक पहुंची, बढ़ती जरूरत के बीच ऊर्जा व्यवस्था पर दबाव

बिहार में बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है और सितंबर में राज्य की अधिकतम बिजली मांग करीब 9.5 गीगावाट
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बिहार में बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है और सितंबर में राज्य की अधिकतम बिजली मांग करीब 9.5 गीगावाट यानी 9,500 मेगावाट तक पहुंच गई है। यह आंकड़ा राज्य की ऊर्जा जरूरतों के लिहाज से महत्वपूर्ण है, क्योंकि बिहार में बिजली की मांग का बड़ा हिस्सा बाहरी स्रोतों से पूरी करना पड़ता है। ताजा जानकारी के मुताबिक राज्य में औसत दैनिक बिजली मांग लगभग 7,300 से 7,400 मेगावाट के आसपास रहती है, जबकि गर्मियों में पीक डिमांड 9,500 मेगावाट तक पहुंच जाती है।

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    बिजली की बढ़ती मांग के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। गर्म मौसम में घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में पंखे, कूलर और एयर कंडीशनर जैसे उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ने से खपत बढ़ती है। इसके अलावा सिंचाई के लिए बिजली से चलने वाले पंपों की जरूरत भी बिजली की मांग को प्रभावित करती है। इस साल कमजोर मानसून और सामान्य से कम बारिश के कारण सिंचाई की जरूरत कई क्षेत्रों में अधिक बनी है। हालांकि, 9.5 गीगावाट की मांग को किसी एक कारण से जोड़ना उचित नहीं होगा।

     

    बिहार के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ बढ़ती मांग नहीं, बल्कि अपनी बिजली उत्पादन क्षमता और कुल जरूरत के बीच का अंतर भी है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार राज्य की अपनी बिजली उत्पादन क्षमता लगभग 550 मेगावाट बताई गई है, जबकि औसत मांग इससे कई गुना अधिक है। ऐसे में राज्य को बिजली की जरूरत पूरी करने के लिए दूसरे स्रोतों और बाहरी बिजली खरीद पर काफी निर्भर रहना पड़ता है।

     

    बिजली खरीद पर होने वाला खर्च भी राज्य के ऊर्जा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा है। हालिया रिपोर्ट के अनुसार बिहार ने वित्त वर्ष 2025-26 में बिजली उपभोक्ताओं से 19,000 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व जुटाया, लेकिन बाहरी स्रोतों से बिजली खरीदने पर सालाना खर्च 25,000 करोड़ से 35,000 करोड़ रुपये के बीच रहा। इससे स्पष्ट होता है कि बिजली की बढ़ती जरूरत को पूरा करना राज्य के लिए केवल तकनीकी ही नहीं, बल्कि वित्तीय चुनौती भी है।

     

    इसी वजह से बिहार सरकार आने वाले वर्षों में अक्षय ऊर्जा पर जोर बढ़ाने की योजना पर काम कर रही है। राज्य ने अगले पांच वर्षों में सौर ऊर्जा के क्षेत्र में बड़े निवेश की योजना बताई है। लक्ष्य 2030 तक 24 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता और 6 गीगावाट-घंटे ऊर्जा भंडारण क्षमता विकसित करना है। इसका उद्देश्य भविष्य में बिजली की बढ़ती मांग को अधिक टिकाऊ तरीके से पूरा करना और बाहरी बिजली खरीद पर निर्भरता कम करना है।

     

    बिजली वितरण व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए भी राज्य में कुछ प्रशासनिक कदम उठाए जा रहे हैं। बिहार ऊर्जा विभाग के सितंबर के नोटिफिकेशन के अनुसार उत्तर और दक्षिण बिहार की बिजली वितरण कंपनियों को नियोजित बिजली कटौती और रखरखाव की जानकारी पहले से ऑनलाइन उपलब्ध कराने की व्यवस्था लागू करने को कहा गया है। इसके साथ ही बिजली सेवा की गुणवत्ता को लेकर डिवीजन स्तर का ऑनलाइन रियल-टाइम डैशबोर्ड विकसित करने की दिशा में भी काम किया जा रहा है।

     

    बिहार में बिजली नियामक व्यवस्था से जुड़े स्तर पर भी ग्रिड और संसाधन उपलब्धता को लेकर नियमों पर काम जारी है। बिहार विद्युत विनियामक आयोग ने बिहार इलेक्ट्रिसिटी ग्रिड कोड, 2026 और रिसोर्स एडिक्वेसी से जुड़े नियमों में बदलाव के लिए आम लोगों और हितधारकों से सुझाव मांगे हैं। इसका उद्देश्य बिजली व्यवस्था की भविष्य की जरूरतों के अनुरूप नियामक ढांचे को मजबूत करना है।

     

    राज्य में 9.5 गीगावाट की पीक मांग इस बात का संकेत है कि बिहार की बिजली व्यवस्था पर आने वाले वर्षों में दबाव और बढ़ सकता है। यदि औद्योगिक गतिविधियों, शहरीकरण, घरेलू खपत और सिंचाई की जरूरत में वृद्धि जारी रहती है, तो उत्पादन, ट्रांसमिशन, वितरण और ऊर्जा भंडारण—चारों क्षेत्रों में क्षमता बढ़ाने की जरूरत होगी।

     

    9.5 गीगावाट की अधिकतम मांग के बीच बिहार के सामने चुनौती यह है कि बढ़ती खपत के साथ बिजली की उपलब्धता और आपूर्ति की विश्वसनीयता बनाए रखी जाए। सौर ऊर्जा में प्रस्तावित निवेश, बेहतर ग्रिड प्रबंधन और वितरण व्यवस्था में सुधार आने वाले वर्षों में इस चुनौती से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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