Human Live Media

HomeNewsबिहार में आरक्षण के मुद्दे पर NDA में मतभेद, कुछ सहयोगी समीक्षा के पक्ष में तो चिराग पासवान ने किया विरोध

बिहार में आरक्षण के मुद्दे पर NDA में मतभेद, कुछ सहयोगी समीक्षा के पक्ष में तो चिराग पासवान ने किया विरोध

  बिहार में आरक्षण व्यवस्था को लेकर सत्तारूढ़ एनडीए के भीतर मतभेद सामने आने लगे हैं। गठबंधन के कुछ नेताओं
jitanram-manjhi-and-chirag-paswan_202608329238

 

Table of Contents

    बिहार में आरक्षण व्यवस्था को लेकर सत्तारूढ़ एनडीए के भीतर मतभेद सामने आने लगे हैं। गठबंधन के कुछ नेताओं ने आरक्षण के मौजूदा ढांचे में बदलाव या आरक्षित वर्गों के भीतर उप-वर्गीकरण की जरूरत बताई है, जबकि केंद्रीय मंत्री और एलजेपी (रामविलास) प्रमुख चिराग पासवान ने किसी भी तरह की समीक्षा का विरोध किया है। इस मुद्दे ने बिहार की राजनीति में एक बार फिर आरक्षण और सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर बहस तेज कर दी है।

     

    राष्ट्रीय लोक मोर्चा के नेता और बिहार सरकार में मंत्री दीपक प्रकाश ने आरक्षित वर्गों के भीतर उप-वर्गीकरण की बात कही है। उनका तर्क है कि आरक्षण का लाभ उन वर्गों तक भी प्रभावी रूप से पहुंचना चाहिए जो सामाजिक और आर्थिक रूप से ज्यादा पिछड़े हैं। उनके अनुसार, केवल आरक्षण की व्यवस्था पर्याप्त नहीं है और समाज के सबसे वंचित समूहों तक सरकारी योजनाओं और अवसरों का लाभ पहुंचाने के लिए व्यवस्था में सुधार की जरूरत हो सकती है।

     

    इसी तरह हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के नेता और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी तथा बिहार सरकार में मंत्री संतोष कुमार सुमन भी आरक्षण के भीतर लाभ के समान वितरण और समीक्षा की मांग का समर्थन कर चुके हैं। इन नेताओं की दलील है कि आरक्षित वर्गों के भीतर भी अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों वाले समूह हैं, इसलिए यह देखना जरूरी है कि मौजूदा व्यवस्था का फायदा सबसे जरूरतमंद लोगों तक कितना पहुंच रहा है।

     

    हालांकि, एनडीए के एक अन्य प्रमुख सहयोगी चिराग पासवान ने इस तरह की समीक्षा या बदलाव पर असहमति जताई है। उन्होंने आरक्षण को संवैधानिक अधिकार बताते हुए इसके साथ किसी भी तरह के ऐसे बदलाव का विरोध किया है, जिससे मौजूदा लाभार्थी वर्गों में असुरक्षा पैदा हो। चिराग पासवान पहले भी आरक्षण से जुड़े कानूनों को संवैधानिक सुरक्षा देने और उन्हें नौवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग उठा चुके हैं।

     

    आरक्षण का मुद्दा बिहार की राजनीति में बेहद संवेदनशील माना जाता है। राज्य में जातीय सर्वेक्षण के बाद सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर प्रतिनिधित्व का सवाल लगातार राजनीतिक बहस का हिस्सा रहा है। 2023 में बिहार सरकार ने आरक्षण का कुल दायरा बढ़ाकर 65 प्रतिशत करने का कानून बनाया था, लेकिन बाद में पटना हाई कोर्ट ने इस बढ़ोतरी को रद्द कर दिया था। इसके बाद से राज्य में आरक्षण की सीमा और इसे कानूनी सुरक्षा देने की मांग लगातार उठती रही है।

     

    अब एनडीए के भीतर ही अलग-अलग सहयोगियों के सामने आने से इस मुद्दे का राजनीतिक महत्व और बढ़ गया है। एक तरफ कुछ नेता आरक्षित वर्गों के भीतर उप-वर्गीकरण के जरिए ज्यादा वंचित समूहों को लाभ देने की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ चिराग पासवान जैसे नेता मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में बदलाव के खिलाफ खड़े दिखाई दे रहे हैं। इससे गठबंधन के भीतर सामाजिक न्याय और आरक्षण को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोण सामने आए हैं।

     

    विपक्ष भी इस बहस को राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा है। आरजेडी और अन्य विपक्षी दल लंबे समय से आरक्षण के दायरे को बढ़ाने और पिछड़े, अति पिछड़े तथा दलित समुदायों के प्रतिनिधित्व को मजबूत करने की मांग करते रहे हैं। ऐसे में एनडीए के नेताओं के बीच सामने आए मतभेद विपक्ष को सरकार पर दबाव बनाने का मौका दे सकते हैं।

     

    बिहार सरकार या एनडीए की ओर से आरक्षण व्यवस्था में किसी तत्काल बदलाव की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। मौजूदा विवाद मुख्य रूप से अलग-अलग गठबंधन नेताओं के बयानों और आरक्षण के भीतर लाभ के वितरण को लेकर उठी मांगों से जुड़ा है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि एनडीए इस मुद्दे पर साझा रुख तैयार करता है या सहयोगी दल अपनी-अपनी राजनीतिक स्थिति के साथ आगे बढ़ते हैं।

    Loading

    Comments are off for this post.