Last updated: September 20th, 2026 at 01:13 pm

टाटा संस और टाटा ट्रस्ट के बीच जारी विवाद अब कानूनी मोड़ लेता नजर आ रहा है। टाटा ट्रस्ट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता और कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी को वकील नियुक्त किया गया है। जिम्मेदारी मिलने के बाद सिंघवी ने इस पूरे विवाद पर दुख जताया और कहा कि उन्हें अफसोस है कि इतने पुराने रिश्ते से जुड़े मामले को आपसी सहमति से नहीं सुलझाया जा सका।
सिंघवी ने रतन टाटा के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों और टाटा समूह की विरासत का जिक्र करते हुए कहा कि विवाद के दोनों पक्षों के प्रमुख लोगों से उनके अच्छे संबंध रहे हैं। ऐसे में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर उनकी पहली प्रतिक्रिया दुख की है।
चैरिटी कमिश्नर के फैसले पर भी उठाए सवाल
अभिषेक मनु सिंघवी ने चैरिटी कमिश्नर की ओर से लगाई गई रोक पर भी सवाल उठाया। उन्होंने इसे अचानक लिया गया और समझ से परे फैसला बताया। सिंघवी के मुताबिक, इस रोक के कारण ट्रस्ट के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।
उन्होंने टाटा ट्रस्ट और टाटा संस के बीच करीब 100 साल पुराने संबंध का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों को अलग करने की कोशिश और ट्रस्ट के निर्णय लेने की प्रक्रिया से जुड़े नियमों की अनदेखी उन्हें उचित नहीं लगती।
सिंघवी ने यह भी कहा कि ट्रस्ट में फैसलों और वोटिंग को लेकर एकमत की व्यवस्था तथा वीटो से जुड़े प्रावधानों को नजरअंदाज किए जाने का मुद्दा महत्वपूर्ण है।
‘शेयरहोल्डर्स के मूल अधिकार खत्म नहीं किए जा सकते’
टाटा ट्रस्ट की ओर से मामले की पैरवी करने की जिम्मेदारी मिलने के बाद सिंघवी ने कहा कि अब वह पेशेवर तौर पर विवाद के एक पक्ष का नेतृत्व कर रहे हैं। उनके मुताबिक, शेयरहोल्डर्स और मालिकों के बुनियादी अधिकारों को इस तरह समाप्त नहीं किया जा सकता।
उन्होंने तर्क दिया कि यदि शेयरधारकों के मूल अधिकारों को खत्म करने का सिद्धांत स्वीकार किया जाता है तो इससे हजारों और लाखों शेयरहोल्डर्स वाली कंपनियों अथवा शेयरधारकों के समूह के स्वामित्व वाली कंपनियों की व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।
टाटा-मिस्त्री मामले का भी किया जिक्र
सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट के टाटा-मिस्त्री मामले का हवाला देते हुए कहा कि वह उस मामले में पेश भी हुए थे। उनके मुताबिक, उस फैसले में टाटा ट्रस्ट की टाटा संस के साथ संबंधों में भूमिका और टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन में मौजूद संबंधित प्रावधानों को महत्व दिया गया था।
सिंघवी ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में ऐसा लगता है कि उस फैसले के कुछ पहलुओं को नजरअंदाज किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि आपसी संवाद की कमी के चलते अब इस विवाद का समाधान अदालत के जरिए होने की संभावना बढ़ गई है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें अब भी इस पूरे विवाद को लेकर दुख है।
आखिर टाटा संस और टाटा ट्रस्ट के बीच विवाद क्या है?
टाटा संस में टाटा ट्रस्ट की करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इसी वजह से टाटा संस के बोर्ड और चेयरमैन से जुड़े फैसलों में ट्रस्ट की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।
मौजूदा घटनाक्रम में टाटा ट्रस्ट की ओर से बोर्ड में शामिल वेणु श्रीनिवासन ने एन चंद्रशेखरन के पक्ष में वोट किया। इसके बाद तीसरे बोर्ड सदस्य हरीश मनवानी के समर्थन से चंद्रशेखरन की नियुक्ति के पक्ष में बहुमत बन गया।
हालांकि, विवाद तब गहरा गया जब टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा ने टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन की नियुक्ति का विरोध किया। इसके बाद टाटा समूह के दो प्रमुख पक्षों के बीच मतभेद खुलकर सामने आने लगे।
रतन टाटा के निधन के बाद 9 अक्टूबर को उनके सौतेले भाई नोएल टाटा ने टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन की जिम्मेदारी संभाली थी। इसके बाद से ट्रस्ट के नियंत्रण, निर्णय प्रक्रिया और नियमों के पालन को लेकर उनका रुख महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब अभिषेक मनु सिंघवी के टाटा ट्रस्ट की ओर से कानूनी लड़ाई में शामिल होने के बाद इस विवाद के अदालत तक पहुंचने की संभावना और बढ़ गई है।
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