Last updated: September 20th, 2026 at 02:37 pm

लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी यानी KGMU में गरीब और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत इलाज कराने वाले मरीजों के लिए महंगे विदेशी इम्प्लांट को लेकर नई व्यवस्था लागू की गई है। अब ऐसे मरीजों के इलाज में विदेशी या अत्यधिक महंगे इम्प्लांट का इस्तेमाल बिना पूर्व लिखित अनुमति के नहीं किया जा सकेगा। अस्पताल प्रशासन ने इसके लिए चिकित्सकों और संबंधित विभागों को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं।
नई व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य सरकारी धन के इस्तेमाल को नियंत्रित करना और जहां चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त हो, वहां भारत में निर्मित इम्प्लांट का इस्तेमाल बढ़ाना है। अस्पताल प्रशासन के निर्देश के अनुसार गरीब, आर्थिक रूप से कमजोर और प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना यानी PMJAY के लाभार्थी मरीजों के लिए पहले उच्च गुणवत्ता वाले और अपेक्षाकृत कम कीमत वाले भारतीय इम्प्लांट उपलब्ध कराने पर जोर दिया जाएगा।
अस्पताल की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि यदि किसी मरीज के इलाज के लिए विदेशी इम्प्लांट वास्तव में चिकित्सकीय रूप से जरूरी माना जाता है, तो संबंधित फैकल्टी सदस्य या सर्जन को पहले लिखित अनुमति लेनी होगी। यह अनुमति मुख्य चिकित्सा अधीक्षक, चिकित्सा अधीक्षक या उप चिकित्सा अधीक्षक स्तर से लेनी होगी। अनुमति मिलने के बाद ही संबंधित इम्प्लांट को अस्पताल के हॉस्पिटल रिवॉल्विंग फंड के माध्यम से जारी किया जा सकेगा।
प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया है कि बिना निर्धारित अनुमति के किसी गरीब या PMJAY मरीज के लिए विदेशी अथवा अत्यधिक महंगा इम्प्लांट जारी करना वित्तीय अनियमितता माना जा सकता है। इससे अस्पताल के अंदर इम्प्लांट की खरीद और इस्तेमाल की प्रक्रिया में जवाबदेही बढ़ाने की कोशिश की गई है।
KGMU प्रशासन के अनुसार इस फैसले का मतलब विदेशी इम्प्लांट पर पूरी तरह रोक लगाना नहीं है। अगर किसी मरीज की स्थिति में भारतीय विकल्प चिकित्सकीय रूप से पर्याप्त नहीं है या किसी विशेष कारण से विदेशी इम्प्लांट जरूरी है, तो डॉक्टर उसकी जरूरत बताते हुए अनुमति मांग सकते हैं। मंजूरी मिलने के बाद ऐसे इम्प्लांट का इस्तेमाल किया जा सकेगा।
अस्पताल प्रशासन ने भारतीय चिकित्सा उपकरणों और इम्प्लांट को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया है। प्रशासन का कहना है कि भारत में अब कई ऐसे चिकित्सा उत्पाद तैयार हो रहे हैं जिनकी गुणवत्ता अंतरराष्ट्रीय उत्पादों के बराबर मानी जाती है। ऐसे मामलों में जब भारतीय उत्पाद मरीज की चिकित्सकीय जरूरत को पूरा कर सकता है, तो महंगे विदेशी उत्पाद पर सरकारी धन खर्च करने की आवश्यकता नहीं होगी।
इस व्यवस्था का असर खास तौर पर उन मरीजों पर पड़ेगा जिनका इलाज सरकारी योजनाओं या अस्पताल के माध्यम से उपलब्ध आर्थिक सहायता से होता है। ऐसे मरीजों के इलाज में इम्प्लांट की लागत भी उपचार के कुल खर्च का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकती है। इसलिए अस्पताल ने महंगे विकल्प के इस्तेमाल से पहले उसकी आवश्यकता और उपलब्ध भारतीय विकल्पों की उपयुक्तता की जांच को जरूरी बनाया है।
अंतिम निर्णय मरीज की चिकित्सकीय जरूरत के आधार पर ही लिया जाना है। यदि इलाज करने वाली टीम किसी विदेशी इम्प्लांट को आवश्यक मानती है, तो उसके लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत अनुमति ली जा सकती है। इस तरह नई व्यवस्था में लागत नियंत्रण के साथ-साथ चिकित्सकीय आवश्यकता को भी ध्यान में रखने का प्रावधान रखा गया है।
KGMU प्रशासन का कहना है कि इस कदम से सरकारी संसाधनों का अधिक सावधानी से इस्तेमाल किया जा सकेगा और उपयुक्त मामलों में भारतीय चिकित्सा उत्पादों को बढ़ावा मिलेगा। वहीं, किसी विशेष मरीज के लिए विदेशी इम्प्लांट की वास्तविक चिकित्सकीय आवश्यकता होने पर अनुमति की व्यवस्था जारी रहेगी। अब अस्पताल में इम्प्लांट के इस्तेमाल से पहले उसकी गुणवत्ता, कीमत और मरीज की जरूरत के बीच संतुलन को ध्यान में रखकर निर्णय लेने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
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