Last updated: September 22nd, 2026 at 12:28 pm

कामयाबी की राह हमेशा आसान नहीं होती। कई बार हालात इंसान के सामने ऐसी चुनौतियां खड़ी कर देते हैं, जहां आगे बढ़ना मुश्किल नजर आता है। मुरादाबाद के एक छोटे से गांव से निकलकर IPS अधिकारी बनीं इल्मा अफरोज की कहानी भी संघर्ष, मेहनत और हौसले की ऐसी ही कहानी है।
पिता को कम उम्र में खोने के बाद आर्थिक परेशानियों के बीच उनकी पढ़ाई जारी रही और आगे चलकर वह दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से लेकर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी तक पहुंचीं। इल्मा ने UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2017 में 217वीं रैंक हासिल की। इसके बाद उनका चयन IPS के लिए हुआ और वह हिमाचल प्रदेश कैडर की 2018 बैच की अधिकारी बनीं।
14 साल की उम्र में पिता को खोया, मां ने नहीं रुकने दी पढ़ाई
इल्मा के पिता किसान थे और जब वह महज 14 साल की थीं, तभी उनका निधन हो गया। इसके बाद परिवार की आर्थिक स्थिति काफी मुश्किल हो गई। मां ने इल्मा और उनके छोटे भाई की परवरिश की और तमाम परेशानियों के बावजूद बच्चों की पढ़ाई जारी रखी।
पिता के निधन के बाद रिश्तेदारों और समाज की ओर से इल्मा की शादी करने का दबाव भी बनाया गया। कई लोगों का मानना था कि बेटी की पढ़ाई पर खर्च करने के बजाय उसकी शादी कर देनी चाहिए। हालांकि, उनकी मां ने इन बातों को नजरअंदाज किया और बेटी की शिक्षा को प्राथमिकता दी।
दिल्ली पहुंचीं तो पास थीं सिर्फ चार जोड़ी सलवार-कमीज
इल्मा ने शुरुआती पढ़ाई बिलारी में की और नौवीं कक्षा के बाद मुरादाबाद शहर में पढ़ाई की। इसके बाद उन्हें दिल्ली यूनिवर्सिटी के सेंट स्टीफंस कॉलेज में दाखिला मिला, जहां उन्होंने फिलॉसफी में ऑनर्स किया।
दिल्ली आने के शुरुआती दिनों में आर्थिक स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके पास सिर्फ चार जोड़ी सलवार-कमीज थीं। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि ये कपड़े गांव के एक परिचित ने उनके लिए सिलकर दिए थे।
कॉलेज में पढ़ाई के साथ उन्होंने डिबेट प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू किया। शुरुआत में यह उनका शौक था, लेकिन प्रतियोगिताओं से मिलने वाली पुरस्कार राशि ने उनके खर्चों में भी मदद की। कभी 500 या 1,000 रुपये तो कभी 5,000 रुपये की पुरस्कार राशि उनके लिए काफी महत्वपूर्ण होती थी।
स्कॉलरशिप से ऑक्सफोर्ड पहुंचीं, विदेश में बर्तन धोकर चलाया खर्च
सेंट स्टीफंस कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद इल्मा को स्कॉलरशिप मिली और वह ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी पहुंचीं। इसके बाद उन्होंने फ्रांस और अमेरिका के न्यूयॉर्क में भी काम किया।
विदेश में पढ़ाई और रहने के दौरान आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने पार्ट टाइम काम किए। उन्होंने बर्तन धोने से लेकर पढ़ाने तक का काम किया। उनके लिए काम की कोई श्रेणी नहीं थी, जरूरत के समय मेहनत करके अपना खर्च चलाना और पढ़ाई जारी रखना ही उनका लक्ष्य था।
विदेश में अच्छे करियर के अवसर मिलने के बावजूद उन्होंने भारत लौटने का फैसला किया। उनका मानना था कि विदेश में हासिल की गई शिक्षा और अनुभव का इस्तेमाल अपने देश और समाज के लिए किया जाना चाहिए।
गांव लौटने पर लोगों की परेशानियों ने बदली दिशा
भारत लौटने के बाद जब इल्मा छुट्टियों में अपने गांव जाती थीं, तो आसपास के लोग अपनी छोटी-बड़ी समस्याओं को लेकर उनके पास आने लगे। किसी को राशन कार्ड बनवाना था, किसी को फॉर्म भरने में मदद चाहिए थी तो किसी को इलाज के लिए अस्पताल पहुंचाना था।
इन अनुभवों ने इल्मा के मन में सिविल सेवा के जरिए बड़े स्तर पर लोगों की मदद करने का विचार मजबूत किया। इसके बाद उन्होंने UPSC की तैयारी शुरू की।
UPSC में 217वीं रैंक, बनीं IPS अधिकारी
मेहनत के बाद इल्मा ने 2017 में UPSC सिविल सेवा परीक्षा पास की और 217वीं रैंक हासिल की। इसके बाद वह हिमाचल प्रदेश कैडर की 2018 बैच की IPS अधिकारी बनीं। उनकी सफलता में उनके भाई का भी योगदान रहा।
परिवार की आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद भाई ने उनकी उच्च शिक्षा को प्राथमिकता दी। बताया जाता है कि उन्होंने दहेज के लिए पैसे जोड़ने के बजाय बहन की पढ़ाई में सहयोग किया।
जून 2026 में इल्मा अफरोज ने हिमाचल प्रदेश के नूरपुर की पुलिस अधीक्षक के तौर पर कार्यभार संभाला। इससे पहले वह बद्दी में भी SP के पद पर तैनात रह चुकी हैं। बद्दी में तैनाती के दौरान उन्होंने अवैध खनन और नशीली दवाओं की तस्करी के खिलाफ अभियान चलाया था।
छोटे से गांव से निकलकर दिल्ली, ऑक्सफोर्ड और न्यूयॉर्क तक पहुंचने और फिर भारत लौटकर IPS अधिकारी बनने तक इल्मा अफरोज का सफर कई संघर्षों से होकर गुजरा। आर्थिक तंगी, सीमित संसाधन और विदेश में पार्ट टाइम काम से लेकर UPSC की तैयारी तक, उनकी कहानी मेहनत और दृढ़ संकल्प के अलग-अलग पड़ाव दिखाती है।
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