Last updated: September 24th, 2026 at 09:46 am

पीडीपी अध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कश्मीरी भाषा और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को लेकर बुधवार को विद्वानों, लेखकों, कवियों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं के साथ बातचीत की। इस दौरान कश्मीरी भाषा को घरों, स्कूलों, मीडिया और सार्वजनिक जीवन में अधिक जगह देने के साथ-साथ पुराने सांस्कृतिक संस्थानों को फिर से सक्रिय करने पर चर्चा हुई।
घर और सार्वजनिक जीवन में कश्मीरी के इस्तेमाल पर जोर
बैठक में शामिल प्रतिभागियों ने कहा कि किसी भाषा का संरक्षण केवल साहित्यिक कार्यक्रमों या शैक्षणिक संस्थानों तक सीमित नहीं रह सकता। इसके लिए कश्मीरी का इस्तेमाल परिवारों, घरों, शिक्षण संस्थानों, समाज और सार्वजनिक मंचों पर लगातार होना जरूरी है।
प्रतिभागियों ने सरकारी संस्थानों और अन्य सार्वजनिक मंचों पर कश्मीरी भाषा को अधिक मान्यता देने और उसके व्यावहारिक इस्तेमाल को बढ़ाने की मांग भी रखी।
रेडियो, दूरदर्शन और अकादमी के योगदान का जिक्र
बातचीत के दौरान रेडियो कश्मीर श्रीनगर, दूरदर्शन श्रीनगर और J&K Academy of Art, Culture and Languages की भूमिका को याद किया गया। प्रतिभागियों के मुताबिक, इन संस्थानों ने दशकों तक कश्मीरी नाटक, कविता, संगीत, साहित्यिक कार्यक्रम और सांस्कृतिक चर्चाओं के लिए मंच उपलब्ध कराया।
J&K Academy के जरिए कश्मीरी साहित्य, सूफी कविता, शोध, प्रकाशन, शब्दकोश और भाषाई-सांस्कृतिक विरासत के दस्तावेजीकरण से जुड़े कार्यों का भी उल्लेख किया गया।
हालांकि, प्रतिभागियों ने इन संस्थानों की मौजूदा दृश्यता और प्रभाव को लेकर चिंता जताई। उनका कहना था कि साहित्यकारों, कलाकारों, संगीतकारों और नाटककारों के लिए नियमित कार्यक्रम और अवसर बढ़ाकर इन संस्थानों को अधिक सक्रिय बनाया जाना चाहिए।
युवा पीढ़ी और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फोकस
बैठक में रचनात्मक और साहित्यिक क्षेत्र से जुड़े लोगों की आर्थिक चुनौतियों पर भी चर्चा हुई। प्रतिभागियों ने कहा कि लंबे समय से कश्मीरी भाषा और संस्कृति के लिए काम कर रहे लोगों को संस्थागत सहयोग और अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन के लिए पर्याप्त मंच मिलना चाहिए।
युवाओं को कश्मीरी में पढ़ने, लिखने और बातचीत के लिए प्रोत्साहित करने पर भी जोर दिया गया। इसके लिए कविता, कहानी, नाटक और संगीत जैसी पारंपरिक विधाओं के साथ डिजिटल मीडिया और आधुनिक प्लेटफॉर्म का अधिक इस्तेमाल करने का सुझाव दिया गया।
महबूबा मुफ्ती ने प्रतिभागियों की चिंताओं और सुझावों को सुना और कश्मीर की भाषाई एवं सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के महत्व पर जोर दिया।
बैठक में इस बात पर सहमति जताई गई कि कश्मीरी भाषा को जीवंत बनाए रखने के लिए समाज, सांस्कृतिक संस्थानों और सरकार को मिलकर काम करना होगा। प्रतिभागियों ने भविष्य में भी विद्वानों, लेखकों, कलाकारों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं के बीच ऐसी बातचीत जारी रखने की जरूरत बताई।
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