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मऊ के आपराधिक मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, 54 में सिर्फ 2 गवाहों की गवाही; SP के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के निर्देश

  उत्तर प्रदेश के मऊ जिले से जुड़े वर्ष 2017 के एक आपराधिक मामले की सुनवाई में देरी को लेकर
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    उत्तर प्रदेश के मऊ जिले से जुड़े वर्ष 2017 के एक आपराधिक मामले की सुनवाई में देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य पुलिस और अभियोजन व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने मऊ में वर्ष 2023 से अब तक तैनात रहे पुलिस अधीक्षकों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने का निर्देश उत्तर प्रदेश सरकार को दिया है। मामला एक 14 वर्षीय किशोर के कथित अपहरण से जुड़ा है, जिसका अब तक पता नहीं चल पाया है।

     

    सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सामने आया कि इस मामले में छह आरोपियों के खिलाफ 27 मार्च 2023 को आरोप तय किए गए थे। इसके बावजूद आरोप तय होने के तीन साल से अधिक समय बाद भी अभियोजन पक्ष के 54 गवाहों में से केवल दो की ही गवाही दर्ज हो सकी है। अदालत ने इस स्थिति को लेकर अभियोजन पक्ष की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए और कहा कि गवाहों को अदालत के सामने पेश कराना जांच एजेंसी और अभियोजन की जिम्मेदारी है।

     

    यह मामला मूल रूप से 27 सितंबर 2017 को सामने आया था। याचिकाकर्ता के 14 वर्षीय बेटे के कथित अपहरण के बाद पुलिस में मामला दर्ज कराया गया था। अदालत के समक्ष उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इतने वर्षों बाद भी न तो किशोर का पता चला है और न ही उसके अवशेष बरामद हुए हैं। मामले की जांच पूरी होने के बाद आरोपपत्र दाखिल किया गया था, लेकिन मुकदमे की सुनवाई आगे बढ़ाने में लगातार देरी हुई।

     

    सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई के दौरान यह भी देखा कि मार्च 2023 में आरोप तय होने के बाद गवाहों की गवाही आगे बढ़ाने में अपेक्षित प्रगति नहीं हुई। अदालत के अनुसार, 54 अभियोजन गवाहों में से केवल दो की जांच हो पाई है। इस स्थिति को देखते हुए अदालत ने कहा कि आपराधिक मुकदमे में गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित करना अभियोजन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

     

    सुनवाई के दौरान मऊ के वर्तमान पुलिस अधीक्षक भी अदालत के सामने पेश हुए थे। अदालत के पहले के निर्देश के बाद उन्होंने 29 अगस्त को एक हलफनामा दाखिल किया था। उसमें यह जानकारी दी गई कि आरोप तय होने के बाद केवल दो गवाहों की गवाही दर्ज हुई है। इसके बाद अदालत ने मामले की प्रगति और पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर विस्तृत विचार किया।

     

    सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वर्ष 2023 से अब तक मऊ जिले में पुलिस अधीक्षक के पद पर रहे अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू की जाए। अदालत ने यह कार्रवाई मुकदमे की निगरानी और गवाहों को अदालत में पेश कराने से जुड़ी जिम्मेदारियों के संदर्भ में निर्देशित की है।

     

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि विभागीय कार्रवाई केवल औपचारिकता तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। संबंधित अधिकारियों की भूमिका और जिम्मेदारी की जांच प्रक्रिया के तहत तय की जाएगी। राज्य सरकार को इस मामले में आगे की कार्रवाई की जानकारी अदालत के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी।

     

    इस मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि कथित रूप से लापता किशोर का अब तक पता नहीं चल पाया है। परिवार की ओर से मामले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराने की मांग भी की गई थी। इससे पहले यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट तक पहुंचा था और बाद में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। शीर्ष अदालत ने मुकदमे की धीमी प्रगति को देखते हुए मामले पर दोबारा गंभीरता से विचार किया।

     

    सुप्रीम कोर्ट ने आगे की सुनवाई के लिए 16 नवंबर की तारीख निर्धारित की है। अदालत ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव से विभागीय जांच में हुई प्रगति और संबंधित कदमों का व्यक्तिगत रूप से सत्यापित हलफनामा दाखिल करने को कहा है। इससे यह स्पष्ट है कि मामले की निगरानी अब शीर्ष अदालत के स्तर पर भी जारी रहेगी।

     

    मऊ के इस मामले ने लंबे समय तक चलने वाले आपराधिक मुकदमों में गवाहों की उपलब्धता, पुलिस की भूमिका और अभियोजन की कार्यप्रणाली से जुड़े सवालों को सामने रखा है। खास तौर पर तब, जब मामला एक नाबालिग के कथित अपहरण से जुड़ा हो और वर्षों बाद भी उसके बारे में कोई ठोस जानकारी सामने न आई हो।

     

    सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद उत्तर प्रदेश सरकार को संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय प्रक्रिया शुरू करनी है। वहीं मूल आपराधिक मामले की सुनवाई भी आगे जारी रहेगी। लापता किशोर का पता लगाने और मुकदमे में बाकी गवाहों की गवाही कराने की प्रक्रिया पर भी अगली सुनवाई में अदालत की नजर रहेगी।

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