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यूपी में विधानसभा और पंचायत वोटर लिस्ट के अंतर पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार से मांगा जवाब

उत्तर प्रदेश में विधानसभा और पंचायत चुनाव की मतदाता सूचियों के बीच अंतर का मामला अब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ
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उत्तर प्रदेश में विधानसभा और पंचायत चुनाव की मतदाता सूचियों के बीच अंतर का मामला अब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच तक पहुंच गया है। रायबरेली की एक ग्राम पंचायत में दोनों चुनावों की वोटर लिस्ट में बड़ी संख्या में मतदाताओं के अंतर को लेकर दाखिल याचिका पर अदालत ने केंद्रीय चुनाव आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा है। दोनों आयोगों को जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी।

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    मामला रायबरेली जिले की मखदूमपुर ग्राम पंचायत से जुड़ा है। ग्राम पंचायत निवासी रोहित की ओर से दाखिल याचिका में मतदाता सूचियों में अंतर का मुद्दा उठाया गया। याचिका पर सुनवाई न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने की। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि पंचायत चुनाव के लिए तैयार की गई मतदाता सूची और विधानसभा चुनाव की मतदाता सूची में मतदाताओं की संख्या एक जैसी नहीं है।

     

    याचिका में बताया गया कि मखदूमपुर ग्राम पंचायत की पंचायत चुनाव वाली मतदाता सूची में कुल 1,987 मतदाता दर्ज हैं, जबकि विधानसभा चुनाव की मतदाता सूची में सिर्फ 1,519 मतदाता हैं। इस तरह दोनों सूचियों के बीच 468 मतदाताओं का अंतर सामने आया। इसी अंतर को लेकर सवाल उठाया गया कि एक ही क्षेत्र के मतदाताओं की संख्या अलग-अलग चुनावों की सूचियों में इतनी अलग कैसे हो सकती है।

     

    सुनवाई के दौरान केंद्रीय चुनाव आयोग की ओर से अदालत में अलग पक्ष रखा गया। आयोग के वकील ने बताया कि विधानसभा और पंचायत चुनावों की मतदाता सूचियां अलग-अलग नियमों और मानकों के आधार पर तैयार की जाती हैं। इसलिए दोनों सूचियों में अंतर होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है। आयोग की ओर से यह भी बताया गया कि विधानसभा मतदाता सूची तैयार करने के दौरान पात्रता और संबंधित क्षेत्र में निवास जैसी शर्तों को ध्यान में रखा जाता है।

     

    हालांकि, मतदाता सूची में 468 नामों के अंतर का मामला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उत्तर प्रदेश में आने वाले चुनावों को लेकर मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण और सत्यापन पहले से ही चर्चा में है। ऐसे समय में अलग-अलग चुनावों के लिए तैयार सूचियों के आंकड़ों में अंतर चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़े सवाल खड़े कर सकता है। हाईकोर्ट ने इसी मामले में दोनों निर्वाचन आयोगों से जवाब मांगकर अब इस अंतर का आधिकारिक कारण स्पष्ट करने की दिशा में कदम बढ़ाया है।

     

    उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की मतदाता सूची को लेकर भी इस साल बड़े स्तर पर पुनरीक्षण किया गया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार पंचायत चुनाव की अंतिम मतदाता सूची में राज्य में 12 करोड़ 58 लाख से अधिक मतदाता दर्ज हैं। पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान नए मतदाताओं के नाम जोड़े गए और मृत, स्थानांतरित या अपात्र मतदाताओं के नाम हटाए गए। ऐसे में अलग-अलग चुनावी सूचियों के बीच अंतर की वजह जानना चुनाव प्रक्रिया के लिहाज से महत्वपूर्ण हो जाता है।

     

    मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी। तब तक केंद्रीय चुनाव आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग को अदालत के सामने अपना जवाब दाखिल करना होगा। उनके जवाब से यह स्पष्ट हो सकता है कि मखदूमपुर ग्राम पंचायत की दोनों मतदाता सूचियों में 468 मतदाताओं का अंतर किन नियमों और प्रक्रियाओं के कारण आया।

     

    इस मामले पर अब लोगों और राजनीतिक दलों की नजर भी रहेगी, क्योंकि मतदाता सूची किसी भी चुनाव की बुनियादी व्यवस्था होती है। मतदाता का नाम सही तरीके से दर्ज होना और पात्र मतदाताओं को मतदान का अवसर मिलना चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है। हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान आयोगों के जवाब से यह साफ होने की उम्मीद है कि मखदूमपुर में सामने आया अंतर सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का परिणाम है या इसके पीछे कोई दूसरी वजह है।

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