Last updated: October 8th, 2026 at 02:12 pm
दिल्ली पुलिस ने एक बड़े अंतरराज्यीय फर्जी दिव्यांग प्रमाणपत्र रैकेट का भंडाफोड़ किया है। इस मामले में पुलिस ने नौ लोगों को गिरफ्तार किया है और उनके कब्जे से 27 कथित फर्जी PwD यानी Persons with Disabilities प्रमाणपत्र बरामद किए हैं। पुलिस के मुताबिक यह नेटवर्क पैसे लेकर छात्रों को फर्जी दिव्यांग प्रमाणपत्र उपलब्ध कराता था, जिनका इस्तेमाल JBT, B.Tech और दूसरे स्नातक पाठ्यक्रमों में PwD कोटे के तहत दाखिला लेने के लिए किया जाता था।
पुलिस की जांच की शुरुआत 31 अगस्त को हुई, जब अलीगढ़ निवासी और फरीदाबाद में रहने वाले 36 वर्षीय ललित कुमार उर्फ आदित्य को पकड़ा गया। उसके पास से उत्तर प्रदेश के बदायूं, बरेली और सिद्धार्थनगर के सरकारी अस्पतालों से जारी बताए जा रहे 16 PwD प्रमाणपत्र मिले। इन प्रमाणपत्रों में सुनने से जुड़ी परेशानी, चलने-फिरने से संबंधित दिव्यांगता और कम दिखाई देने जैसी श्रेणियां दर्ज थीं। पुलिस ने उसके पास से तीन मोबाइल फोन और एक लैपटॉप भी बरामद किया।
पूछताछ में पुलिस को कथित नेटवर्क के काम करने के तरीके की जानकारी मिली। जांच के अनुसार ललित नोएडा के एक शिक्षा सलाहकार रोशन कुमार समेत अन्य लोगों के संपर्क में था। आरोप है कि ये लोग छात्रों की व्यक्तिगत जानकारी, फोटो, हस्ताक्षर और अन्य दस्तावेज जुटाते थे। इसके बाद कथित तौर पर फर्जी प्रमाणपत्र तैयार कराने की प्रक्रिया शुरू की जाती थी। पुलिस के मुताबिक एक प्रमाणपत्र के लिए करीब 20 हजार से 30 हजार रुपये तक लिए जाते थे।
इस मामले में एक और गंभीर बात सामने आई है। पुलिस के अनुसार आरोपियों ने कुछ छात्रों के आधार कार्ड में दर्ज पते को कथित तौर पर AI टूल की मदद से बदलकर ऐसे जिलों का पता दिखाया, जहां से दिव्यांग प्रमाणपत्र बनवाने की व्यवस्था की जा सके। इनमें सिद्धार्थनगर, बदायूं, बरेली और गोरखपुर जैसे जिले शामिल बताए गए हैं। इसके बाद संबंधित जानकारी को Unique Disability ID यानी UDID पोर्टल पर आवेदन के लिए इस्तेमाल किया जाता था।
जांच के दौरान पुलिस ने नोएडा में कंसल्टेंसी चलाने वाले रोशन कुमार को 1 सितंबर को गिरफ्तार किया। आरोप है कि वह छात्रों की आधार संबंधी जानकारी, फोटो, हस्ताक्षर और OTP जैसी जानकारी इकट्ठा करके आगे भेजता था। इसके बाद 3 सितंबर को बरेली के मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय के दिव्यांग विभाग में संविदा पर काम करने वाले कंप्यूटर ऑपरेटर कुलदीप को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने उसके पास से मोबाइल फोन और डेस्कटॉप बरामद किया। आरोप है कि इसी सिस्टम का इस्तेमाल फर्जी मेडिकल रिपोर्ट तैयार करने और उन्हें पोर्टल पर अपलोड करने में किया जाता था।
पुलिस ने इस मामले में बरेली दिव्यांग बोर्ड के सदस्य डॉ. लक्ष्मी कांत सक्सेना और शेर सिंह सोलंकी को भी गिरफ्तार किया है। इसके अलावा सिद्धार्थनगर के दिव्यांग कार्यालय में तैनात वरिष्ठ मलेरिया निरीक्षक जय प्रकाश शुक्ला को 10 सितंबर को पकड़ा गया। पुलिस का आरोप है कि उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए पैसे के बदले प्रमाणपत्र तैयार कराने में मदद की। जांच के दौरान बैंक लेनदेन के जरिए सुरेंद्र रस्तोगी तक भी पुलिस पहुंची और उसे 19 सितंबर को गिरफ्तार किया गया।
संतोषजनक सत्यापन के बिना बनाए गए ऐसे प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल शिक्षा में आरक्षण और अन्य सरकारी सुविधाओं का गलत तरीके से लाभ लेने के लिए किया जा सकता था। इसी वजह से पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि इस नेटवर्क ने कितने छात्रों के लिए प्रमाणपत्र तैयार किए और इनमें से कितने प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल वास्तव में दाखिले के लिए हुआ। पुलिस उन छात्रों की भूमिका की भी जांच कर रही है, जिनके नाम पर ये प्रमाणपत्र बनाए गए थे।
जांच में आगे और गिरफ्तारियां भी हुईं। सीतापुर से आदेश सिंह को 12 सितंबर को गिरफ्तार किया गया और उसके घर से नौ दिव्यांग प्रमाणपत्र बरामद किए गए। वहीं देवरिया के मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय में जूनियर असिस्टेंट के रूप में काम करने वाले धीरेंद्र कुमार पांडेय को 18 सितंबर को गिरफ्तार किया गया। पुलिस का आरोप है कि वह कथित तौर पर फर्जी प्रमाणपत्र तैयार करके उन्हें दूसरे व्यक्ति तक पहुंचाता था।
पुलिस ने इस कार्रवाई में 27 फर्जी दिव्यांग प्रमाणपत्रों के अलावा एक लैपटॉप, मैकबुक, डेस्कटॉप, 11 मोबाइल फोन, 75 हजार रुपये नकद और एक मर्सिडीज कार भी बरामद की है। मोबाइल फोन में प्रमाणपत्रों से संबंधित कथित बातचीत और अन्य जानकारी मिलने की बात कही गई है। पुलिस अब नेटवर्क से जुड़े एक अन्य व्यक्ति चंदन सिंह यादव की तलाश कर रही है। साथ ही सरकारी अस्पतालों में तैनात कुछ डॉक्टरों की भूमिका की भी जांच की जा रही है।
दिल्ली पुलिस के इस खुलासे से साफ है कि फर्जी दस्तावेजों के जरिए शिक्षा व्यवस्था में आरक्षण का गलत फायदा उठाने की कोशिश एक गंभीर समस्या बन सकती है। अब जांच का अगला चरण यह पता लगाना है कि इस पूरे नेटवर्क का दायरा कितना बड़ा था, कितने प्रमाणपत्र जारी किए गए और किन-किन संस्थानों में उनका इस्तेमाल किया गया।
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