Last updated: October 13th, 2026 at 03:29 pm

बिहार में खेल प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने और खिलाड़ियों को बेहतर भविष्य देने की दिशा में राज्य सरकार की ‘मेडल लाओ, नौकरी पाओ’ योजना चर्चा में है। इस योजना के तहत पिछले दो वर्षों में 181 खिलाड़ियों को उनकी खेल उपलब्धियों के आधार पर सरकारी नौकरी मिली है। इनमें 95 पुरुष और 86 महिला खिलाड़ी शामिल हैं। यह आंकड़ा बताता है कि बिहार में खेल को केवल प्रतियोगिता या पदक जीतने तक सीमित रखने के बजाय इसे रोजगार और करियर से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
सरकारी नौकरी मिलने से खिलाड़ियों को आर्थिक स्थिरता के साथ अपने खेल को आगे बढ़ाने का अवसर भी मिलता है। प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने, प्रशिक्षण लेने, बेहतर डाइट की व्यवस्था करने और राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन करने के लिए अक्सर पर्याप्त संसाधनों की जरूरत होती है। ऐसे में नौकरी की सुरक्षा खिलाड़ियों और उनके परिवारों की चिंता कम कर सकती है। सरकार की इस पहल का उद्देश्य भी यही है कि प्रतिभाशाली खिलाड़ी आर्थिक कठिनाइयों के कारण खेल छोड़ने को मजबूर न हों।
योजना के तहत पात्र खिलाड़ियों को उनकी उपलब्धियों और निर्धारित नियमों के आधार पर विभिन्न सरकारी पदों पर नियुक्ति का अवसर दिया जाता है। इनमें पुलिस उपाधीक्षक यानी डीएसपी, सब-इंस्पेक्टर, पंचायती राज पदाधिकारी और अन्य उपयुक्त पद शामिल हैं। नियुक्ति के लिए खिलाड़ियों की खेल उपलब्धियों तथा संबंधित नियमों को ध्यान में रखा जाता है। इसका अर्थ है कि केवल खेल में भाग लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि निर्धारित पात्रता और उपलब्धियों के मानकों को पूरा करना आवश्यक है।
इस योजना के तहत क्रिकेट जगत के कुछ चर्चित नामों को भी सरकारी सेवा में अवसर मिला है। भारतीय क्रिकेट टीम के तेज गेंदबाज आकाश दीप और मुकेश कुमार को उनके खेल प्रदर्शन के आधार पर डीएसपी पद पर नियुक्ति दी गई है। इन नियुक्तियों से यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को सम्मान देने के साथ उनके भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए भी कदम उठाए जा सकते हैं।
महिला खिलाड़ियों की भागीदारी भी इस पहल का महत्वपूर्ण पहलू है। कुल 181 लाभार्थियों में 86 महिलाएं हैं, यानी लगभग आधी नियुक्तियां महिला खिलाड़ियों के हिस्से में आई हैं। खेलों में महिलाओं को कई बार सामाजिक सोच, संसाधनों की कमी और परिवार की जिम्मेदारियों जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में सरकारी नौकरी का अवसर उन्हें आत्मनिर्भर बनने और खेल को पेशेवर करियर के रूप में जारी रखने का भरोसा दे सकता है।
रग्बी खिलाड़ी सपना कुमारी की यात्रा इस बदलाव का उदाहरण है। खेल के दौरान उन्हें सामाजिक विरोध और संसाधनों की कमी जैसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने प्रतियोगिताओं में अच्छा प्रदर्शन किया और पदक जीतकर अपनी पहचान बनाई। उनकी उपलब्धियों के बाद उन्हें सरकारी सेवा में अवसर मिला। इसी तरह फुटबॉल खिलाड़ी श्यामा रानी ने भी खेल के क्षेत्र में अपनी पहचान स्थापित की और सरकारी नौकरी के माध्यम से खेल गतिविधियों से जुड़ी जिम्मेदारियां निभाने का अवसर पाया।
नौकरी के अलावा बिहार में खिलाड़ियों को प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के लिए भी विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही हैं। ‘प्रेरणा’, ‘सक्षम’ और ‘उत्कर्ष’ जैसी पहलों के माध्यम से पात्र खिलाड़ियों को सहायता देने का प्रावधान है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इन योजनाओं में पात्रता और संबंधित नियमों के अधीन तीन लाख रुपये से लेकर 20 लाख रुपये तक की आर्थिक सहायता मिल सकती है। इससे खिलाड़ियों को प्रशिक्षण, डाइट और प्रतियोगिताओं की तैयारी में मदद मिल सकती है।
हालांकि, योजना की वास्तविक सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों के प्रतिभाशाली खिलाड़ियों तक इसकी जानकारी पहुंचे, चयन प्रक्रिया पारदर्शी रहे और खेल सुविधाओं का विस्तार हो। केवल नौकरी की घोषणा पर्याप्त नहीं है; खिलाड़ियों को शुरुआती स्तर से बेहतर कोचिंग, मैदान, उपकरण और प्रतियोगिताओं में भाग लेने के अवसर भी चाहिए।
बिहार सरकार की इस पहल से राज्य के युवाओं को खेलों में करियर बनाने के लिए प्रोत्साहन मिल सकता है। 181 खिलाड़ियों को सरकारी नौकरी मिलना उन प्रतिभाओं के लिए सकारात्मक संकेत है जो पढ़ाई और रोजगार की चिंता के कारण खेल से दूरी बनाने लगते हैं। आने वाले समय में योजना का दायरा, सुविधाओं की उपलब्धता और चयन प्रक्रिया कितनी प्रभावी रहती है, यह तय करेगा कि बिहार खेल के क्षेत्र में कितनी आगे बढ़ पाता है।
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