Last updated: October 16th, 2026 at 06:39 pm

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में धार्मिक जागरूकता बढ़ाने के लिए मुत्ताहिदा मजलिस-ए-उलेमा (MMU) ने एक नई पहल शुरू की है। इसके तहत कश्मीर घाटी, जम्मू, चिनाब घाटी, करगिल और लेह की मस्जिदों व इमामबाड़ों में शुक्रवार को एक साथ जुमे के खुत्बे दिए गए। इस पहल का पहला साझा विषय ‘ईमान’ रखा गया, जिसके जरिए लोगों को धार्मिक मूल्यों, नैतिक जिम्मेदारी और अपने विश्वास पर कायम रहने का संदेश दिया गया।
इस मौके पर मीरवाइज़-ए-कश्मीर डॉ. मौलवी मोहम्मद उमर फारूक ने चरार-ए-शरीफ़ स्थित हजरत शेख नूर-उद-दीन नूरानी की ऐतिहासिक खानकाह में लोगों को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि ईमान केवल जुबान से विश्वास जताने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर व्यक्ति के चरित्र, व्यवहार, फैसलों और दूसरों के साथ उसके बर्ताव में भी दिखाई देना चाहिए।
दुनियावी फायदे के लिए ईमान से समझौता न करें
मीरवाइज़ ने अपने खुत्बे में कहा कि ईमान इंसान के लिए सबसे कीमती अमानत है। धन, पद, प्रभाव या निजी लाभ के लिए अपने विश्वास, जमीर और उसूलों से समझौता नहीं करना चाहिए।
उन्होंने कुरआन की शिक्षाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि अल्लाह पर विश्वास इंसान में जवाबदेही की भावना पैदा करता है, पैगंबर मुहम्मद की शिक्षाएं नैतिक मार्गदर्शन देती हैं और कुरआन सच्चाई व नेकी का रास्ता दिखाता है।
मीरवाइज़ के मुताबिक, ईमान की असली परीक्षा उस समय होती है, जब व्यक्ति के सामने सच्चाई और निजी स्वार्थ या सिद्धांतों और तत्काल लाभ के बीच चुनाव करने की स्थिति आती है। ऐसे समय में मुश्किलों और दबाव के बावजूद सही रास्ते पर बने रहना जरूरी है।
युवाओं में धार्मिक जागरूकता बढ़ाने पर जोर
खुत्बे के दौरान मीरवाइज़ ने युवा पीढ़ी के सामने मौजूद चुनौतियों पर भी चिंता जताई। उन्होंने भौतिकवाद, सोशल मीडिया के गलत इस्तेमाल, नैतिक उलझनों और धार्मिक चेतना में कमी जैसे मुद्दों का जिक्र किया।
उन्होंने माता-पिता, शिक्षकों, उलेमा और धार्मिक संस्थानों से अपील की कि वे युवाओं में ईमान और नैतिक मूल्यों को मजबूत करने के लिए मिलकर काम करें। साथ ही, युवाओं को सवाल पूछने और ज्ञान व समझ के जरिए अपनी शंकाओं का समाधान तलाशने के लिए प्रोत्साहित करने पर भी जोर दिया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि अपने विश्वास पर दृढ़ रहने का अर्थ कट्टरता या टकराव नहीं है। इसके बजाय, इंसान को समझदारी, धैर्य, गरिमा और नैतिक साहस के साथ अपने सिद्धांतों पर कायम रहना चाहिए।
15 सितंबर की उलेमा कॉन्फ्रेंस के फैसले के बाद पहल
MMU की यह पहल 15 सितंबर को आयोजित उलेमा कॉन्फ्रेंस में लिए गए फैसलों के बाद शुरू हुई है। उस बैठक में विभिन्न धार्मिक विचारधाराओं से जुड़े विद्वानों ने सहमति जताई थी कि महत्वपूर्ण धार्मिक और सामाजिक मुद्दों पर सामूहिक रूप से काम किया जाएगा।
इसके तहत साझा जुमे के खुत्बों, जिला स्तर पर कार्यक्रमों और लगातार चलने वाले सामुदायिक जागरूकता अभियानों के जरिए लोगों तक संदेश पहुंचाने की योजना बनाई गई है।
मीरवाइज़ ने कहा कि ‘ईमान’ को पहला साझा विषय इसलिए चुना गया, क्योंकि यह मुस्लिम समुदाय को जोड़ने वाला बुनियादी तत्व है। उन्होंने उलेमा और इमामों से भी अपील की कि वे मस्जिद के मंच का इस्तेमाल धार्मिक मूल्यों को मजबूत करने, समाज का मार्गदर्शन करने और लोगों के बीच एकता बढ़ाने के लिए करें।
शेख-उल-आलम की शिक्षाओं और कश्मीरी भाषा का जिक्र
अपने संबोधन में मीरवाइज़ ने हजरत शेख नूर-उद-दीन नूरानी, जिन्हें शेख-उल-आलम और अलमदार-ए-कश्मीर के नाम से भी जाना जाता है, की शिक्षाओं को याद किया। उन्होंने कहा कि इस महान सूफी संत ने कश्मीर के लोगों तक ईश्वर की एकता, ईमान, आत्मिक शुद्धि और नैतिक जिम्मेदारी का संदेश स्थानीय भाषा में पहुंचाया।
उन्होंने शेख-उल-आलम की शिक्षाओं और उनकी काव्य रचनाओं को कश्मीर की इस्लामी तथा सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। मीरवाइज़ ने कहा कि उनकी विरासत को आगे बढ़ाने का अर्थ केवल उन्हें याद करना नहीं, बल्कि उनके बताए मूल्यों को अपने जीवन में अपनाना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना भी है।
अंत में उन्होंने लोगों से कुरआन और पैगंबर मुहम्मद की शिक्षाओं के साथ अपने रिश्ते को मजबूत करने, बच्चों के धार्मिक मूल्यों की रक्षा करने और चुनौतियों के बावजूद सच्चाई व नेकी के रास्ते पर कायम रहने की अपील की।
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