Last updated: October 25th, 2026 at 11:21 am

दिल्ली के रामलीला मैदान में 1 नवंबर 2026 को प्रस्तावित विपक्ष की महारैली को लेकर 1984 के सिख-विरोधी दंगों से प्रभावित कुछ परिवारों ने नाराजगी जताई है। पीड़ित परिवारों का कहना है कि 1 नवंबर उनके लिए अपनों को खोने और हिंसा की दर्दनाक यादों से जुड़ी तारीख है। ऐसे में इस दिन बड़े राजनीतिक कार्यक्रम का आयोजन उनकी भावनाओं को आहत कर सकता है। उन्होंने कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन से रैली की तारीख पर पुनर्विचार करने की मांग की है।
IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ दंगा पीड़ित परिवारों ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर प्रस्तावित रैली की अनुमति नहीं देने की मांग करने की बात कही है। उनका कहना है कि यदि रैली आयोजित होती है, तो वे विरोध प्रदर्शन करेंगे। हालांकि, रैली की अनुमति और विरोध से जुड़ी आधिकारिक स्थिति की पुष्टि अलग से की जानी चाहिए।
गांधी परिवार और कांग्रेस पर लगाए आरोप
1984 की हिंसा से प्रभावित परिवारों ने कांग्रेस और गांधी परिवार पर भी सवाल उठाए हैं। पीड़ितों का कहना है कि घटना के 42 साल बाद भी वे अपने परिजनों को खोने का दर्द नहीं भुला पाए हैं। उनके मुताबिक, राजनीतिक दलों को ऐसे संवेदनशील दिन पर कार्यक्रम आयोजित करते समय पीड़ित परिवारों की भावनाओं का ध्यान रखना चाहिए।
पीड़ितों ने मांग की है कि कांग्रेस 1 नवंबर को प्रस्तावित रैली आयोजित करने के फैसले पर पुनर्विचार करे। उनका कहना है कि इस तारीख का उनके लिए विशेष भावनात्मक और ऐतिहासिक महत्व है।
‘सिख समुदाय के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा’
एक दंगा पीड़ित ने IANS से बातचीत में कहा कि 1984 की हिंसा की यादें आज भी प्रभावित परिवारों को परेशान करती हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि उस दौरान सिख समुदाय के लोगों और उनके कारोबार को निशाना बनाया गया तथा कई जगह संपत्तियों को आग के हवाले किया गया।
पीड़ित ने सवाल उठाया कि जब 1 नवंबर की तारीख हजारों परिवारों के लिए त्रासदी की याद दिलाती है, तो इसी दिन इतनी बड़ी राजनीतिक रैली आयोजित करने की जरूरत क्यों है। उनके मुताबिक, इस दिन रैली करना पीड़ितों के दुख को फिर से उभारने जैसा है।
उन्होंने जून 1984 में दरबार साहिब में हुई सैन्य कार्रवाई सहित सिख समुदाय से जुड़े अन्य ऐतिहासिक घटनाक्रमों का भी जिक्र किया। उनका कहना था कि इन घटनाओं की यादें आज भी समुदाय के लोगों के मन में मौजूद हैं।
पीड़ित महिला बोलीं- परिवार के चार लोगों को खोया
विरोध की चेतावनी देने वाली एक महिला ने कहा कि 1984 की हिंसा में उनके परिवार के चार लोगों की मौत हुई थी। उन्होंने राहुल गांधी के नेतृत्व में प्रस्तावित रैली पर आपत्ति जताते हुए कहा कि यदि कार्यक्रम आयोजित हुआ, तो वे इसका विरोध करेंगी।
महिला ने कहा कि जिन परिवारों ने अपने पति, बच्चों और अन्य रिश्तेदारों को खोया, उनके दर्द और न्याय की मांगों को समझना जरूरी है। उन्होंने आरोप लगाया कि हिंसा के दौरान सिखों को उनकी पहचान, विशेषकर पगड़ी, के आधार पर निशाना बनाया गया।
महिला के मुताबिक, उनके परिवार में 1 से 5 नवंबर तक पाठ और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इस दौरान परिवार के लोग एक साथ बैठकर दिवंगत परिजनों को याद करते हैं और अपना दुख साझा करते हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री, केंद्र सरकार और गृह मंत्री अमित शाह से पीड़ितों की भावनाओं को समझने की अपील की।
जगदीश टाइटलर, सज्जन कुमार और कमलनाथ के नाम लेकर उठाए सवाल
एक अन्य पीड़ित ने राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व पर सिख समुदाय की भावनाओं की अनदेखी करने का आरोप लगाया। उन्होंने 1984 की हिंसा के संदर्भ में कांग्रेस के कुछ नेताओं की भूमिका पर सवाल उठाए और जगदीश टाइटलर, सज्जन कुमार तथा कमलनाथ के नाम का उल्लेख किया।
पीड़ित का आरोप था कि हिंसा के लिए जिम्मेदार बताए जाने वाले कुछ नेताओं को राजनीतिक जिम्मेदारियां दी गईं। उन्होंने कहा कि सिख परिवार आज भी अपने परिजनों की मौत और धार्मिक स्थलों को हुए नुकसान को याद करते हैं और उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद है।
इन आरोपों के संदर्भ में संबंधित नेताओं की कानूनी स्थिति और प्रत्येक मामले के अदालती निष्कर्षों को अलग-अलग देखना जरूरी है।
राजीव गांधी के बयान का भी किया जिक्र
1984 की हिंसा से प्रभावित कमलजीत सिंह धीर ने भी प्रस्तावित रैली पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को राजनीतिक कार्यक्रम आयोजित करने के बजाय पीड़ित परिवारों से माफी मांगने और उनके दर्द को समझने पर ध्यान देना चाहिए।
धीर ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के उस कथित बयान का जिक्र किया, जिसमें बड़े पेड़ के गिरने पर धरती हिलने की बात कही गई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि 1984 में दिल्ली में तीन हजार से अधिक सिखों की हत्या हुई थी और कल्याणपुरी तथा त्रिलोकपुरी जैसे इलाकों में भी लोगों को निशाना बनाया गया।
धीर ने कहा कि सिख समुदाय इस हिंसा को नहीं भूल सकता और राजनीतिक दलों को पीड़ित परिवारों की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए।
रैली को लेकर राजनीतिक विवाद
1 नवंबर को रामलीला मैदान में प्रस्तावित विपक्षी रैली का उद्देश्य SIR और चुनाव आयोग से जुड़े मुद्दों को उठाना बताया जा रहा है। वहीं, 1984 की हिंसा से प्रभावित कुछ परिवारों ने इसी तारीख को कार्यक्रम आयोजित करने पर आपत्ति जताई है।
इस विवाद में एक ओर विपक्ष की रैली और उसके राजनीतिक मुद्दे हैं, तो दूसरी ओर पीड़ित परिवारों की ऐतिहासिक स्मृतियां और भावनाएं। अब यह देखना होगा कि रैली के आयोजक इन आपत्तियों पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं और कार्यक्रम की तारीख को लेकर कोई बदलाव होता है या नहीं।
![]()
Comments are off for this post.