Last updated: November 4th, 2026 at 12:07 pm

बिहार के विश्वविद्यालयों और अंगीभूत कॉलेजों में काम करने वाले पुनर्नामित डेमोंस्ट्रेटर्स को पटना हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि वर्ष 1991 के बाद गैर-शिक्षण पदों से डेमोंस्ट्रेटर बनाए गए कर्मचारियों को शिक्षक का दर्जा, शिक्षकों के समान वेतनमान और अन्य वित्तीय लाभ पाने का कानूनी अधिकार नहीं है।
जस्टिस हरीश कुमार की एकल पीठ ने शंकर प्रसाद शर्मा और अन्य की ओर से दायर 96 याचिकाओं को खारिज कर दिया। इन याचिकाओं में कर्मचारियों ने शिक्षक कैडर में शामिल करने के साथ शिक्षकों के समान वेतनमान और पदोन्नति का लाभ देने की मांग की थी।
लैब असिस्टेंट और टेक्नीशियन से जुड़ा है मामला
यह विवाद वर्ष 1976 से 1991 के बीच बिहार के अलग-अलग विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में नियुक्त लैब असिस्टेंट, लैब टेक्नीशियन और लैब इंचार्ज से संबंधित है। राज्य सरकार ने वर्ष 2006 में लिए गए फैसलों के तहत इन कर्मचारियों के पदों का पुनर्गठन कर उन्हें डेमोंस्ट्रेटर के रूप में नामित किया था।
इसके बाद बिहार राज्य विश्वविद्यालय (संशोधन एवं विधिमान्यकरण) अधिनियम, 2012 और सरकार के अन्य आदेशों के जरिए उनके पदनाम और वेतनमान को गैर-शिक्षण कर्मचारियों के अनुरूप निर्धारित किया गया। कर्मचारियों ने इसी व्यवस्था को चुनौती देते हुए पटना हाईकोर्ट में याचिकाएं दाखिल की थीं।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का दिया गया हवाला
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में दलील दी गई कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले दुर्गा प्रसाद सिंह मामले में उनके पद, रैंक और वेतन की सुरक्षा की थी। इसलिए उन्हें भी शिक्षकों के समान वेतनमान और पदोन्नति का लाभ मिलना चाहिए। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि वर्ष 2012 के संशोधन के अनुसार शिक्षक की कानूनी परिभाषा में प्रोफेसर, रीडर और लेक्चरर शामिल हैं। डेमोंस्ट्रेटर्स को इस श्रेणी में जगह नहीं दी गई है।
अंतरिम राहत का मतलब शिक्षक का दर्जा नहीं
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से पहले दी गई अंतरिम राहत की व्याख्या भी की। अदालत के मुताबिक, उस राहत का उद्देश्य संबंधित कर्मचारियों के पदनाम को सुरक्षित रखना था। इसका अर्थ यह नहीं था कि उन्हें शिक्षकों के समान वेतनमान, पदोन्नति या अन्य वित्तीय सुविधाएं भी मिलेंगी।
इस तरह अदालत ने पदनाम की सुरक्षा और शिक्षक कैडर के वित्तीय लाभों के बीच अंतर स्पष्ट किया।
1975 से पहले नियुक्त कर्मचारियों को विशेष प्रावधान
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून में 18 सितंबर 1975 से पहले स्वीकृत पदों पर नियुक्त डेमोंस्ट्रेटर्स के लिए विशेष प्रावधान मौजूद है। लेकिन मौजूदा याचिकाकर्ता इस श्रेणी में शामिल नहीं होते हैं। इस फैसले के बाद बिहार के विभिन्न विश्वविद्यालयों और अंगीभूत कॉलेजों में कार्यरत पूर्व लैब सहायकों और डेमोंस्ट्रेटर्स की शिक्षक कैडर में शामिल होने तथा UGC के शिक्षक वेतनमान का लाभ पाने की मांग खारिज हो गई है। फैसले से संबंधित कर्मचारियों में निराशा है।
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