Last updated: April 16th, 2026 at 10:28 am

जम्मू-कश्मीर में प्रस्तावित परिसीमन बिल को लेकर राजनीतिक माहौल तेजी से गर्म हो गया है। गुरुवार को संसद में पेश होने वाले इस बिल के चलते क्षेत्र की सियासत में बड़े बदलाव की संभावना जताई जा रही है। राजनीतिक दलों ने पहले से ही अपनी-अपनी चिंताएं और प्रतिक्रियाएं सामने रखनी शुरू कर दी हैं।
इस प्रस्तावित बिल के तहत जम्मू-कश्मीर में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ने की चर्चा है। मौजूदा पांच सीटों के बढ़कर आठ तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। वहीं, केंद्र शासित प्रदेशों के लिए कुल संसदीय सीटों को 19 से बढ़ाकर 35 करने का प्रस्ताव भी सामने आया है। हालांकि, विधानसभा सीटों में कितनी बढ़ोतरी होगी, इस पर अभी स्पष्ट जानकारी नहीं है।
विशेषज्ञों का मानना है कि परिसीमन के जरिए क्षेत्र की राजनीतिक ताकत का संतुलन बदल सकता है। कश्मीर मामलों के जानकारों के अनुसार, अब आम मतदाता संसद के महत्व को पहले से ज्यादा समझने लगा है और चाहता है कि उसके प्रतिनिधि राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी भूमिका निभाएं।
संवैधानिक विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यदि परिसीमन जनसंख्या और भौगोलिक मानकों के आधार पर होता है, तो जम्मू क्षेत्र को इसका ज्यादा लाभ मिल सकता है। अनुमान है कि बढ़ने वाली सीटों में से अधिकांश जम्मू क्षेत्र में जा सकती हैं।
वहीं, कई राजनीतिक दलों ने इस प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि पिछली बार हुआ परिसीमन कई मामलों में पक्षपातपूर्ण नजर आया था। नेताओं का मानना है कि अगर परिसीमन निष्पक्ष तरीके से नहीं किया गया, तो यह केवल कुछ खास दलों को फायदा पहुंचाने वाला कदम साबित हो सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़ने से जम्मू-कश्मीर का राष्ट्रीय राजनीति में प्रभाव भी बढ़ेगा। ऐसे में क्षेत्र के लोग चाहते हैं कि संसद में उनकी आवाज पहले से ज्यादा मजबूत हो।
अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि प्रमुख राजनीतिक दल इस बिल पर क्या रुख अपनाते हैं और परिसीमन की प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ती है।
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