Last updated: May 24th, 2026 at 02:46 pm

देश की राजधानी New Delhi में स्थित University of Delhi की लॉ फैकल्टी को नॉर्थ कैंपस से दूसरी जगह शिफ्ट करने के प्रस्ताव को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। इस मुद्दे पर छात्र संगठनों, शिक्षकों और राजनीतिक दलों के बीच बहस तेज हो गई है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक विश्वविद्यालय प्रशासन कैंपस के पुनर्विकास और आधारभूत ढांचे के विस्तार को ध्यान में रखते हुए लॉ फैकल्टी को दूसरे परिसर में स्थानांतरित करने पर विचार कर रहा है। हालांकि इस प्रस्ताव के सामने आते ही छात्रों ने विरोध शुरू कर दिया।
कई छात्र संगठनों का कहना है कि लॉ फैकल्टी केवल एक शैक्षणिक संस्थान नहीं बल्कि दिल्ली की छात्र राजनीति और ऐतिहासिक पहचान का महत्वपूर्ण केंद्र रही है। छात्रों का आरोप है कि बिना व्यापक चर्चा और सहमति के ऐसा फैसला लेना उचित नहीं होगा।
छात्र नेताओं ने कहा कि नॉर्थ कैंपस की केंद्रीय स्थिति के कारण छात्रों को लाइब्रेरी, प्रशासनिक सुविधाओं और अन्य शैक्षणिक संसाधनों तक आसानी से पहुंच मिलती है। यदि फैकल्टी को दूर स्थानांतरित किया गया तो हजारों छात्रों को दैनिक आवाजाही और सुविधाओं से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
उधर विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि अभी केवल प्रस्ताव स्तर पर चर्चा चल रही है और अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। अधिकारियों के अनुसार छात्रों और शिक्षकों की राय को भी ध्यान में रखा जाएगा।
इस मुद्दे पर छात्र राजनीति भी गर्म हो गई है। कई छात्र संगठनों ने विरोध प्रदर्शन और हस्ताक्षर अभियान शुरू कर दिया है। कुछ संगठनों ने प्रशासन के खिलाफ आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी है।
राजनीतिक दलों ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी है। विपक्षी नेताओं ने छात्रों की चिंताओं को जायज बताते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन से पारदर्शिता बरतने की मांग की है। वहीं कुछ नेताओं का कहना है कि आधुनिक सुविधाओं और विस्तार के लिए बदलाव जरूरी हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी लंबे समय से छात्र राजनीति का बड़ा केंद्र रही है। ऐसे में लॉ फैकल्टी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से जुड़ा कोई भी फैसला राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का विषय बन जाता है।
सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा तेजी से वायरल हो रहा है। छात्र और पूर्व छात्र लगातार अपनी प्रतिक्रियाएं साझा कर रहे हैं। कई लोगों ने लॉ फैकल्टी की ऐतिहासिक पहचान को बनाए रखने की मांग की है।
फिलहाल विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र संगठनों के बीच बातचीत की संभावना जताई जा रही है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और बड़ा छात्र आंदोलन बन सकता है यदि प्रशासन ने स्पष्ट रुख नहीं अपनाया।
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