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BRICS में भारत की बढ़ती भूमिका, 2026 शिखर सम्मेलन से वैश्विक नेतृत्व को मिल सकता है नया आयाम

वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में तेजी से बदलते समीकरणों के बीच BRICS समूह की भूमिका लगातार मजबूत होती जा रही
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वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में तेजी से बदलते समीकरणों के बीच BRICS समूह की भूमिका लगातार मजबूत होती जा रही है। ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका से शुरू हुआ यह मंच अब कई नए सदस्य देशों के शामिल होने के बाद और अधिक प्रभावशाली बन गया है। वर्ष 2026 में भारत BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और इसी क्रम में नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष रुचि दिखाई दे रही है।

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    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए यह केवल एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन नहीं है, बल्कि वैश्विक मंच पर अपनी नेतृत्व क्षमता को प्रदर्शित करने का महत्वपूर्ण अवसर भी है। भारत लंबे समय से विकासशील देशों और वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज को अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में मजबूत प्रतिनिधित्व दिलाने की वकालत करता रहा है। BRICS मंच इस दिशा में भारत को एक प्रभावशाली अवसर प्रदान करता है।

    BRICS का उद्देश्य सदस्य देशों के बीच आर्थिक, वित्तीय, तकनीकी और रणनीतिक सहयोग को बढ़ावा देना है। पिछले कुछ वर्षों में इस समूह का विस्तार हुआ है और इसकी वैश्विक आर्थिक हिस्सेदारी भी बढ़ी है। कई विश्लेषकों का मानना है कि BRICS अब केवल एक आर्थिक मंच नहीं रह गया, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगा है।

    भारत की अध्यक्षता के दौरान कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा होने की संभावना है। इनमें वैश्विक व्यापार, आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती, डिजिटल अर्थव्यवस्था, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा और विकासशील देशों के लिए वित्तीय सहयोग जैसे मुद्दे प्रमुख हो सकते हैं। भारत इन विषयों पर साझा सहमति विकसित करने का प्रयास कर सकता है।

    हाल ही में BRICS देशों के बीच शिक्षा और अनुसंधान सहयोग को लेकर भी नई पहल सामने आई है। रिपोर्टों के अनुसार भारत और रूस के सहयोग से BRICS विश्वविद्यालय रैंकिंग प्रणाली विकसित करने की योजना पर चर्चा हो रही है। इसका उद्देश्य सदस्य देशों के शैक्षणिक संस्थानों को वैश्विक स्तर पर अधिक पहचान दिलाना और शिक्षा क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा देना है।

    भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (Digital Public Infrastructure) भी BRICS देशों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। आधार, UPI और डिजिलॉकर जैसी प्रणालियों को कई विकासशील देश रुचि के साथ देख रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अपनी डिजिटल सफलता के अनुभवों को अन्य सदस्य देशों के साथ साझा कर सकता है।

    अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में बहुपक्षीय सहयोग पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। व्यापारिक तनाव, क्षेत्रीय संघर्ष, ऊर्जा संकट और जलवायु चुनौतियों जैसी समस्याओं के समाधान के लिए देशों के बीच सहयोग आवश्यक माना जा रहा है। BRICS इस सहयोग को मजबूत करने का एक प्रमुख मंच बन सकता है।

    भारत की विदेश नीति में भी BRICS का विशेष स्थान है। एक ओर भारत अमेरिका, यूरोप और अन्य पश्चिमी देशों के साथ संबंध मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर BRICS जैसे मंचों के माध्यम से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ भी सहयोग बढ़ा रहा है। इस संतुलित कूटनीतिक दृष्टिकोण को भारत की रणनीतिक ताकत माना जाता है।

    आर्थिक दृष्टि से भी BRICS भारत के लिए महत्वपूर्ण है। सदस्य देशों के बीच व्यापार, निवेश और तकनीकी सहयोग बढ़ने से भारतीय उद्योगों और व्यवसायों को नए अवसर मिल सकते हैं। विशेष रूप से विनिर्माण, डिजिटल सेवाओं और ऊर्जा क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं देखी जा रही हैं।

    विश्लेषकों का मानना है कि नई दिल्ली में होने वाला BRICS शिखर सम्मेलन भारत की वैश्विक भूमिका को और मजबूत करने का अवसर बन सकता है। यदि भारत सदस्य देशों के बीच प्रभावी सहमति और सहयोग को बढ़ावा देने में सफल रहता है, तो उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और अधिक बढ़ सकती है।

    फिलहाल दुनिया की नजर आगामी BRICS शिखर सम्मेलन पर टिकी हुई है। भारत की अध्यक्षता में लिए जाने वाले निर्णय न केवल सदस्य देशों के लिए बल्कि वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।

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