Last updated: June 15th, 2026 at 11:22 am

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (15 जून) को बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की नियुक्ति को लेकर दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र, राज्य सरकार और भारत निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी किया है।
यह याचिका सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह द्वारा दायर की गई है, जिसमें सवाल उठाया गया है कि बिना विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बने दीपक प्रकाश को दोबारा मंत्री पद कैसे दिया गया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान यह भी पूछा कि क्या दीपक प्रकाश अभी भी मंत्री पद पर बने हुए हैं। याचिकाकर्ता की ओर से पुष्टि किए जाने के बाद अदालत ने संबंधित पक्षों से जवाब तलब किया।
याचिका में दलील दी गई है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(4) के अनुसार कोई भी गैर-विधायक व्यक्ति अधिकतम छह महीने तक ही मंत्री रह सकता है, और इस अवधि के भीतर उसे सदन की सदस्यता हासिल करनी होती है।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि दीपक प्रकाश को पहले नवंबर 2025 में मंत्री बनाया गया था, जबकि वे उस समय किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। बाद में अप्रैल 2026 में सरकार बदलने के बाद मंत्रिपरिषद भंग हुई और मई 2026 में उन्हें फिर से मंत्री पद पर नियुक्त कर दिया गया।
याचिका में कहा गया है कि यह दोबारा नियुक्ति संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन है और 6 महीने की सीमा को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाने का प्रयास है, जो कि कानून के खिलाफ है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसले एस.आर. चौधरी बनाम पंजाब राज्य (2001) का हवाला भी दिया गया है, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि बिना सदस्यता वाले मंत्री की 6 महीने की सीमा को दोबारा रीसेट नहीं किया जा सकता।
याचिकाकर्ता ने अदालत से ‘रिट ऑफ क्वो वारंटो’ जारी करने की मांग की है, ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि दीपक प्रकाश किस संवैधानिक अधिकार के तहत मंत्री पद पर बने हुए हैं। अब इस मामले में सभी पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने को कहा गया है, और अगली सुनवाई में इस संवैधानिक प्रश्न पर विस्तार से विचार किया जाएगा।
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