Last updated: September 11th, 2026 at 10:29 am

नई दिल्ली: भारत में BRICS Summit के बीच संगठन की बढ़ती ताकत और उसके भविष्य को लेकर रणनीतिक बहस तेज हो गई है। एक नए विश्लेषण में यह सवाल उठाया गया है कि क्या भारत के लिए मजबूत और बेहद प्रभावशाली BRICS ज्यादा फायदेमंद है, या फिर ऐसा मंच बेहतर है जिसमें अलग-अलग देशों के हितों के कारण किसी एक देश का दबदबा कायम न हो सके।
BRICS का विस्तार बना भारत के लिए नई चुनौती
BRICS के विस्तार के बाद समूह में अब 11 सदस्य देश हैं और इसका वैश्विक आर्थिक व राजनीतिक प्रभाव पहले के मुकाबले काफी बढ़ गया है। लेकिन बढ़ते प्रभाव के साथ भारत के सामने चीन की भूमिका को लेकर रणनीतिक सवाल भी खड़े हुए हैं।
भारत और चीन दोनों BRICS के प्रमुख सदस्य हैं, लेकिन आर्थिक और सैन्य क्षमता के मामले में चीन भारत से काफी आगे है। ऐसे में आशंका जताई जाती है कि अगर BRICS भविष्य में एक मजबूत राजनीतिक या रणनीतिक गठबंधन के रूप में उभरता है, तो चीन अपने प्रभाव का इस्तेमाल अपने वैश्विक हितों को आगे बढ़ाने के लिए कर सकता है।
अमेरिका के साथ रिश्ते भी भारत के लिए अहम
भारत की विदेश नीति में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अन्य रणनीतिक साझेदारों की भूमिका महत्वपूर्ण है। ऐसे में भारत के सामने चुनौती यह है कि BRICS में सक्रिय रहते हुए वह अपने दूसरे रणनीतिक रिश्तों को भी संतुलित रखे।
यही वजह है कि BRICS की किसी ऐसी पहल को लेकर भारत सतर्क रह सकता है, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से चीन की वैश्विक स्थिति मजबूत हो।
डी-डॉलराइजेशन का मुद्दा भी पेचीदा
BRICS में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने यानी de-dollarisation की चर्चा लंबे समय से होती रही है। विश्लेषण में तर्क दिया गया है कि भारत की डॉलर व्यवस्था को लेकर अपनी चिंताएं हो सकती हैं, लेकिन डॉलर के प्रभाव को कम करने का फायदा किस देश को मिलेगा, यह भी भारत के लिए महत्वपूर्ण सवाल है।
अगर डॉलर की भूमिका कमजोर होने से मुख्य लाभ चीन को मिलता है, तो भारत के लिए रणनीतिक स्थिति और जटिल हो सकती है। इसलिए अमेरिका के साथ मतभेद और चीन के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को एक ही नजरिए से देखना भारत के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
क्या BRICS को कमजोर रखना भारत के हित में होगा?
विश्लेषण का सबसे अहम तर्क यही है कि भारत के लिए BRICS को खत्म करना जरूरी नहीं, बल्कि समूह के भीतर शक्ति संतुलन बनाए रखना ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है। अलग-अलग क्षेत्रों और अलग-अलग रणनीतिक हितों वाले देशों के बढ़ने से समूह के भीतर किसी एक मुद्दे पर सर्वसम्मति बनाना मुश्किल हो सकता है।
भारत इस विविधता के जरिए BRICS को किसी एक देश के प्रभाव में जाने से रोकने की कोशिश कर सकता है। खासकर मध्य पूर्व और एशिया के देशों के बीच मौजूद मतभेद समूह के भीतर शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं।
रणनीति में भारत के लिए जोखिम भी
हालांकि BRICS की पहलों को लगातार कमजोर करने की कोशिश भारत के लिए उलटी भी पड़ सकती है। इससे समूह के दूसरे सदस्य देशों के बीच भारत को लेकर भरोसा कम हो सकता है और वह संगठन में अलग-थलग पड़ सकता है।
चीन के साथ तनाव बढ़ने की स्थिति में आर्थिक और सैन्य दबाव का जोखिम भी बना रहेगा। इसलिए भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती BRICS को छोड़ना या उसे हर हाल में मजबूत बनाना नहीं, बल्कि संगठन के भीतर रहते हुए अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करना है।
BRICS का विस्तार भारत के लिए एक साथ मौका और चुनौती दोनों है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि भारत चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच इस मंच पर शक्ति संतुलन किस तरह बनाए रखता है।
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