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‘वंदे मातरम’ और भारतीय संस्कृति पर गीतांजलि आंग्मो की बेबाक राय, बोलीं- विविधता ही देश की ताकत

नई दिल्ली: एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंग्मो ने ‘वंदे मातरम’, भारतीय संस्कृति, धार्मिक विविधता और शिक्षा व्यवस्था जैसे
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नई दिल्ली: एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंग्मो ने ‘वंदे मातरम’, भारतीय संस्कृति, धार्मिक विविधता और शिक्षा व्यवस्था जैसे कई मुद्दों पर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि देश की सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते हुए अलग-अलग विचारों और परंपराओं के लिए सम्मान की भावना जरूरी है।

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    ‘वंदे मातरम’ को लेकर क्या बोलीं गीतांजलि आंग्मो?

    गीतांजलि आंग्मो ने ‘वंदे मातरम’ के मूल भाव को भारतभूमि के प्रति सम्मान और मातृभाव से जोड़ते हुए कहा कि देश की हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखना जरूरी है। उनके मुताबिक, समाज में लोगों के बीच जितनी समस्या दिखाई देती है, उससे कहीं अधिक कई बार राजनीतिक एजेंडे और नैरेटिव के कारण विभाजन पैदा होता है।

    उन्होंने कहा कि साथ रहने के लिए अपनी पहचान को दबाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। उनका मानना है कि व्यक्ति अपनी संस्कृति और विचारों को बनाए रखते हुए दूसरों की पहचान का भी सम्मान कर सकता है।

    ‘दूसरों को जगह देने के लिए खुद को छोटा न समझें’

    आंग्मो ने भारत में अलग-अलग सांस्कृतिक प्रभावों को स्वीकार किए जाने का जिक्र करते हुए कहा कि बाहरी प्रभावों को अपनाने का अर्थ अपनी पुरानी संस्कृति से दूरी बनाना नहीं है। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा और अन्य संस्कृतियों के बीच संवाद से समाज और समृद्ध हो सकता है।

    उन्होंने डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के उदाहरण का उल्लेख करते हुए कहा कि अलग-अलग धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथों को पढ़ना व्यक्ति के ज्ञान को व्यापक बनाता है। उनके मुताबिक, किसी दूसरे धर्म के विचारों को समझना अपनी आस्था छोड़ना नहीं है।

    विविधता की तुलना बॉटनिकल गार्डन से

    भारतीय समाज की विविधता समझाते हुए गीतांजलि आंग्मो ने बॉटनिकल गार्डन का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग रंग, आकार और खुशबू वाले फूल मिलकर ही किसी उद्यान को खूबसूरत बनाते हैं।

    उन्होंने ‘मोनोकल्चर’ यानी एकरूपता के बजाय विविधता और आपसी सहयोग को बेहतर बताया। उनका कहना है कि समाज और राजनीति में भी लोगों और विचारों को एक जैसा बनाने के बजाय उनकी अलग पहचान का सम्मान होना चाहिए।

    समाज में संतुलन को बताया जरूरी

    आंग्मो ने कहा कि एक बेहतर समाज वही होगा जहां हर व्यक्ति को अपनी पहचान और विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता मिले और वह दूसरे व्यक्ति को भी ऐसा करने की आजादी दे। उन्होंने अलग-अलग विचारधाराओं को एक जिगसॉ पजल के टुकड़ों से जोड़ते हुए कहा कि अलग-अलग हिस्से मिलकर ही पूरी तस्वीर तैयार करते हैं।

    भारतीय दर्शन को शिक्षा में शामिल करने की वकालत

    शिक्षा व्यवस्था पर बात करते हुए गीतांजलि आंग्मो ने भारतीय दर्शन को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने की जरूरत बताई। उन्होंने वेद, उपनिषद, गीता, न्याय, वैशेषिक और अद्वैत वेदांत जैसे भारतीय दार्शनिक परंपराओं के अध्ययन की वकालत की।

    उनका सवाल था कि यदि विद्यार्थियों को तर्कशास्त्र और दर्शन की पढ़ाई कराई जाती है, तो भारतीय दर्शन की प्रमुख परंपराओं को भी समान महत्व क्यों न दिया जाए। उन्होंने बच्चों को विभिन्न दार्शनिक विचारों से परिचित कराने और आगे चलकर अपनी पसंद का दृष्टिकोण चुनने की बात कही।

    दसवीं तक समान बुनियादी शिक्षा की मांग

    गीतांजलि आंग्मो ने कहा कि देश के हर बच्चे को कम से कम दसवीं कक्षा तक समान बुनियादी शिक्षा मिलनी चाहिए। उनका मानना है कि सरकारी और निजी स्कूलों के बीच बुनियादी शिक्षा की गुणवत्ता में बड़ा अंतर नहीं होना चाहिए।

    उन्होंने सरकारी स्कूलों की स्थिति, कक्षाओं और बच्चों के पोषण से जुड़ी चुनौतियों पर भी चिंता जताई।

    परीक्षा प्रणाली में बदलाव की जरूरत

    परीक्षा व्यवस्था पर उन्होंने कहा कि केवल पेपर लीक रोकने के लिए परीक्षा संचालन में बदलाव पर्याप्त नहीं है। यह भी तय करना जरूरी है कि परीक्षा के जरिए विद्यार्थियों की किस क्षमता का आकलन किया जा रहा है।

    उनके अनुसार, शिक्षा व्यवस्था को सिर्फ रटने की क्षमता पर केंद्रित करने के बजाय विद्यार्थियों की समझ, ज्ञान को व्यवहार में लागू करने की क्षमता और उनके समग्र विकास पर ध्यान देना चाहिए।

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