Last updated: August 29th, 2026 at 10:21 am

नई दिल्ली: भारत ने अमेरिका से करीब 100 जैवलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल खरीदने की दिशा में कदम बढ़ाया है। लगभग 45.7 मिलियन डॉलर यानी करीब 300 करोड़ रुपये की यह डील ऐसे समय में सामने आई है, जब भारत एक ओर रूस और चीन के साथ एससीओ तथा ब्रिक्स जैसे बहुपक्षीय मंचों पर सक्रिय है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक और रक्षा संबंधों को भी मजबूत बनाए हुए है।
करीब 100 मिसाइल और 25 लॉन्च यूनिट की खरीद
प्रस्तावित सौदे के तहत भारतीय सेना को 100 जैवलिन मिसाइल राउंड, 25 लाइटवेट कमांड लॉन्च यूनिट और उनसे जुड़े उपकरण मिलने की बात सामने आई है। जैवलिन को आधुनिक एंटी-टैंक प्रणाली माना जाता है और इसमें ‘फायर एंड फॉरगेट’ तकनीक का इस्तेमाल होता है।
इस तकनीक में लक्ष्य निर्धारित करने के बाद मिसाइल को लगातार ऑपरेटर द्वारा निर्देशित करने की आवश्यकता नहीं होती। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से बख्तरबंद वाहनों और अन्य संरक्षित लक्ष्यों के खिलाफ किया जाता है।
भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग को मिलेगा नया आयाम
भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने इस प्रस्तावित खरीद को दोनों देशों के रक्षा सहयोग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है। अमेरिका लंबे समय से भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार मानता रहा है।
इस डील का एक अहम पहलू भविष्य में भारत में जैवलिन के संभावित संयुक्त उत्पादन से भी जुड़ा है। अमेरिकी कंपनियां लॉकहीड मार्टिन और रेथियॉन इस प्रणाली के निर्माण से जुड़ी हैं और भारत की कंपनी भारत डायनेमिक्स लिमिटेड के साथ सहयोग की संभावनाओं पर भी काम हुआ है।
भारतीय सेना के लिए क्यों अहम है जैवलिन?
भारतीय सेना पहले से ही अलग-अलग देशों से हासिल एंटी-टैंक प्रणालियों का इस्तेमाल करती है। इनमें फ्रांस की मिलान और रूस की कोंकर्स मिसाइलें शामिल हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों में बदलती सुरक्षा चुनौतियों के बीच सेना को आधुनिक और प्रभावी एंटी-टैंक प्रणालियों की जरूरत बनी हुई है।
जैवलिन की खरीद को इसी जरूरत से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि भारत स्वदेशी एंटी-टैंक मिसाइल प्रणालियां विकसित करने पर भी लगातार काम कर रहा है।
ब्रिक्स और एससीओ के बीच भारत की संतुलन नीति
जैवलिन सौदे का महत्व केवल सैन्य जरूरत तक सीमित नहीं माना जा रहा। भारत एक साथ रूस, चीन और अमेरिका के साथ अपने संबंधों को अलग-अलग रणनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर आगे बढ़ा रहा है।
एक तरफ भारत ब्रिक्स और एससीओ जैसे मंचों पर रूस और चीन के साथ सक्रिय है, तो दूसरी ओर अमेरिका के साथ रक्षा तकनीक और सैन्य सहयोग को विस्तार दे रहा है। ऐसे में जैवलिन सौदे को भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और संतुलन साधने की नीति के तौर पर देखा जा सकता है।
भारत पहले भी अमेरिका से एम777 हॉवित्जर, सिग सॉयर राइफल और अन्य रक्षा उपकरण खरीद चुका है। नई डील दोनों देशों के रक्षा औद्योगिक सहयोग को आगे बढ़ाने का एक और संकेत मानी जा रही है।
भारत में निर्माण की राह भी हो सकती है आसान
भारत का लक्ष्य केवल तत्काल सैन्य जरूरतों को पूरा करना नहीं, बल्कि रक्षा क्षेत्र में तकनीक और उत्पादन क्षमता को मजबूत करना भी है। जैवलिन के संभावित संयुक्त उत्पादन से भविष्य में भारतीय रक्षा उद्योग को फायदा मिल सकता है।
हालांकि, भारत स्वदेशी एंटी-टैंक प्रणालियों पर भी काम कर रहा है। ऐसे में अमेरिकी प्रणाली की खरीद को तत्काल क्षमता बढ़ाने और भविष्य में घरेलू उत्पादन क्षमता विकसित करने—दोनों दृष्टिकोणों से देखा जा रहा है।
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