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मुर्शिदाबाद बना चुनावी संग्राम का केंद्र, ‘बाबरी मॉडल मस्जिद’ और हुमायूं कबीर से बदले समीकरण

मुर्शिदाबाद, पश्चिम बंगाल : पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बीच मुर्शिदाबाद जिला एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में
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मुर्शिदाबाद, पश्चिम बंगाल : पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बीच मुर्शिदाबाद जिला एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण यह इलाका अब धार्मिक और चुनावी मुद्दों के कारण चर्चा में है, जहां सियासी समीकरण तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं।

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    भागीरथी नदी के किनारे बसे इस जिले में मुस्लिम बहुल आबादी के साथ कई अन्य समुदायों की मौजूदगी चुनावी गणित को जटिल बनाती है। पहले जहां कांग्रेस और वाम दलों का दबदबा था, वहीं अब मुकाबला मुख्य रूप से तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच सिमट गया है।

    ‘बाबरी मॉडल मस्जिद’ बना चुनावी मुद्दा

    जिले के बेलडांगा इलाके में प्रस्तावित एक मस्जिद, जिसे अयोध्या की बाबरी मस्जिद के डिजाइन से प्रेरित बताया जा रहा है, इस चुनाव में बड़ा मुद्दा बन गई है। इस परियोजना से जुड़े हुमायूं कबीर के राजनीतिक कदमों ने चुनावी माहौल को और गर्म कर दिया है।

     वोट बैंक की राजनीति और नए समीकरण

    हुमायूं कबीर के सक्रिय होने से मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण की चर्चा तेज हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे सबसे ज्यादा असर तृणमूल कांग्रेस पर पड़ सकता है, क्योंकि वोटों के बंटवारे से विपक्ष को फायदा मिल सकता है।

    भाजपा का बढ़ता प्रभाव

    साल 2021 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने मुर्शिदाबाद में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई थी। इस बार पार्टी और बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद में है। भाजपा नेताओं का दावा है कि इस बार वे जिले की कई सीटों पर जीत दर्ज कर सकते हैं।

    तृणमूल की चुनौती और अंदरूनी असंतोष

    हालांकि, पिछले चुनाव में बड़ी जीत हासिल करने वाली तृणमूल कांग्रेस अभी भी मजबूत स्थिति में मानी जा रही है, लेकिन उम्मीदवार बदलने और स्थानीय स्तर पर असंतोष जैसी चुनौतियां उसके सामने हैं।

    कांग्रेस-वाम भी सक्रिय

    कभी इस क्षेत्र में मजबूत पकड़ रखने वाले कांग्रेस और वाम दल भी अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश में जुटे हैं। जंगीपुर और फरक्का जैसी सीटों पर मुकाबला दिलचस्प होने की संभावना है।

    कुल मिलाकर तस्वीर

    मुर्शिदाबाद में इस बार चुनाव सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि सामाजिक और धार्मिक मुद्दों के प्रभाव का भी है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यहां के मतदाता किस दिशा में फैसला करते हैं और किस पार्टी को इसका फायदा मिलता है।

     

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