Last updated: August 29th, 2026 at 10:37 am

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने अपनी राजनीतिक रणनीति में एक अहम संकेत दिया है। पार्टी की ओर से ब्राह्मण चेहरे को चुनावी मैदान में उतारने की तैयारी को लेकर यूपी की सियासत में चर्चा तेज हो गई है। इसे AIMIM की मुस्लिम मतदाताओं से आगे निकलकर दूसरे सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
2022 में भी उतारा था ब्राह्मण उम्मीदवार
AIMIM ने उत्तर प्रदेश में यह प्रयोग पहली बार 2022 के विधानसभा चुनाव में किया था। पार्टी ने गाजियाबाद की साहिबाबाद सीट से पंडित मनमोहन झा उर्फ गामा को उम्मीदवार बनाया था। वह लंबे समय तक समाजवादी पार्टी से जुड़े रहे थे।
उस चुनाव में मनमोहन झा को 4,305 वोट मिले थे। हालांकि वह चुनाव जीत नहीं सके, लेकिन AIMIM ने इस फैसले के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की थी कि पार्टी केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं है।
2027 से पहले क्यों बढ़ रही सक्रियता?
आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए AIMIM उत्तर प्रदेश में अपना संगठन मजबूत करने में जुटी है। असदुद्दीन ओवैसी लगातार यह दावा करते रहे हैं कि उनकी पार्टी को सिर्फ ‘वोट काटने वाली पार्टी’ के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
पार्टी की कोशिश मुस्लिम मतदाताओं के साथ-साथ पिछड़े, दलित और सवर्ण समुदायों के बीच भी राजनीतिक आधार तैयार करने की बताई जा रही है। इसी कड़ी में ब्राह्मण चेहरे को आगे बढ़ाना अहम माना जा रहा है।
यूपी में ब्राह्मण वोट क्यों महत्वपूर्ण?
उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में ब्राह्मण मतदाताओं का प्रभाव लंबे समय से चर्चा में रहा है। अलग-अलग चुनावों में इस समुदाय का झुकाव विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर देखने को मिला है।
बीजेपी, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी पहले से ही अलग-अलग सामाजिक समीकरणों के जरिए ब्राह्मण मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करती रही हैं। ऐसे में AIMIM की एंट्री इस मुकाबले को और दिलचस्प बना सकती है।
मुस्लिम वोटों से आगे बढ़ने की कोशिश?
राजनीतिक रूप से AIMIM की पहचान मुख्य रूप से मुस्लिम प्रतिनिधित्व की राजनीति से जुड़ी रही है। लेकिन ओवैसी अब पार्टी की पहुंच दूसरे समुदायों तक बढ़ाने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं।
ब्राह्मण उम्मीदवार को मैदान में उतारना इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पार्टी के लिए चुनौती यह होगी कि क्या वह मुस्लिम मतदाताओं के अपने आधार को बनाए रखते हुए अन्य सामाजिक समूहों का समर्थन भी हासिल कर पाएगी।
अखिलेश यादव के लिए भी चुनौती?
ओवैसी की सक्रियता का सीधा असर समाजवादी पार्टी की चुनावी रणनीति पर पड़ सकता है। AIMIM यदि मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करती है, तो सपा के पारंपरिक सामाजिक समीकरण पर प्रभाव पड़ने की संभावना है।
ओवैसी पहले ही अखिलेश यादव को गठबंधन का प्रस्ताव दे चुके हैं। दूसरी ओर, दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक बयानबाजी भी जारी है। ऐसे में 2027 के चुनाव में AIMIM की भूमिका खास तौर पर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में महत्वपूर्ण हो सकती है।
क्या AIMIM बना पाएगी नया सामाजिक समीकरण?
AIMIM के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने मौजूदा राजनीतिक आधार को व्यापक सामाजिक गठबंधन में बदलने की है। ब्राह्मण उम्मीदवार उतारना इसी दिशा में एक प्रयोग हो सकता है, लेकिन केवल टिकट देने से किसी समुदाय का समर्थन सुनिश्चित नहीं होता।
अब नजर इस बात पर होगी कि AIMIM कितनी सीटों पर चुनाव लड़ती है, किन सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व देती है और क्या उसका यह नया समीकरण 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में वास्तविक राजनीतिक प्रभाव पैदा कर पाता है।
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