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पटना के बांस घाट का संचालन अब ईशा फाउंडेशन के हाथों, शुल्क और लीज व्यवस्था पर शुरू हुई सियासी बहस

बिहार की राजधानी पटना स्थित ऐतिहासिक बांस घाट श्मशान अब पूरी तरह आधुनिक सुविधाओं से लैस हो गया है। स्मार्ट
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बिहार की राजधानी पटना स्थित ऐतिहासिक बांस घाट श्मशान अब पूरी तरह आधुनिक सुविधाओं से लैस हो गया है। स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत बिहार अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (BUIDCO) ने लगभग 89.40 करोड़ रुपये की लागत से इस आधुनिक शवदाह गृह का निर्माण कराया है। इसके संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी ईशा फाउंडेशन को सौंपी गई है।

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    करीब 4.5 एकड़ में विकसित इस परिसर में एक साथ 18 शवों के अंतिम संस्कार की व्यवस्था की गई है। यहां इलेक्ट्रिक क्रेमेटोरियम, पारंपरिक चिता स्थल, लकड़ी आधारित शवदाह व्यवस्था, वातानुकूलित प्रतीक्षालय, पेयजल, शौचालय सहित कई आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं। सरकार का कहना है कि इस परियोजना का उद्देश्य अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित, स्वच्छ और सम्मानजनक बनाना है।

    हालांकि, इस फैसले के बाद राज्य की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने आरोप लगाया है कि सरकारी धन से तैयार की गई सार्वजनिक सुविधा को बेहद कम लीज राशि पर निजी संस्था को सौंप दिया गया है। पार्टी ने सोशल मीडिया के माध्यम से इस निर्णय पर सवाल उठाते हुए अंतिम संस्कार शुल्क बढ़ने का भी मुद्दा उठाया है।

    इस बीच वरिष्ठ पत्रकार पुष्यमित्र ने भी सोशल मीडिया पर दावा किया कि आधुनिक बांस घाट में अंतिम संस्कार के लिए न्यूनतम शुल्क पहले की तुलना में अधिक है। उन्होंने यह भी कहा कि लकड़ी या गैस आधारित अंतिम संस्कार, धार्मिक अनुष्ठान और अन्य सेवाओं के लिए अलग-अलग शुल्क लिए जा सकते हैं। साथ ही उन्होंने भविष्य में बिहार के अन्य शहरों में भी इसी मॉडल के विस्तार की संभावना जताई।

    दूसरी ओर, ईशा फाउंडेशन का कहना है कि संस्था वर्षों से आधुनिक और पर्यावरण-अनुकूल शवदाह गृहों का संचालन कर रही है। बिहार में भी उसी अनुभव के आधार पर स्वच्छ, व्यवस्थित और सम्मानजनक अंतिम संस्कार व्यवस्था उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है।

    सरकार ने भी अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा है कि इस पहल का उद्देश्य गंगा प्रदूषण कम करना, आधुनिक तकनीक को बढ़ावा देना और लोगों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना है। फिलहाल बांस घाट के संचालन, लीज व्यवस्था और शुल्क को लेकर राजनीतिक बयानबाजी जारी है, जबकि सरकार और विपक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ आमने-सामने हैं।

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