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पीएम मोदी ने स्लोवाकिया में भेंट किया छठ प्रसाद ‘ठेकुआ’, भारतीय परंपरा को मिला वैश्विक मंच

Bihar Cultural Pride: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्लोवाकिया यात्रा के दौरान भारतीय संस्कृति का एक खास और भावनात्मक दृश्य देखने
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Bihar Cultural Pride:

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    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्लोवाकिया यात्रा के दौरान भारतीय संस्कृति का एक खास और भावनात्मक दृश्य देखने को मिला। इस दौरान प्रधानमंत्री ने स्लोवाकिया की संसद के अध्यक्ष रिचर्ड राशी को बिहार और झारखंड की आस्था से जुड़ा छठ महापर्व का पवित्र प्रसाद ‘ठेकुआ’ भेंट किया। इस कदम को भारतीय सांस्कृतिक विरासत के वैश्विक सम्मान के रूप में देखा जा रहा है।

    सांस्कृतिक पहचान के रूप में ठेकुआ

    ठेकुआ केवल एक पारंपरिक प्रसाद या मिठाई नहीं, बल्कि बिहार और पूर्वी भारत की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक माना जाता है। छठ पूजा के दौरान इसे विशेष रूप से बनाया जाता है और सूर्य देव को अर्पित किया जाता है। प्रधानमंत्री द्वारा इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करना भारतीय परंपराओं की वैश्विक स्वीकार्यता का संदेश देता है।

    सोशल मीडिया पर चर्चा

    दीघा से विधायक डॉ. संजीव चौरसिया ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि यह भारतीय संस्कृति और आस्था के वैश्विक विस्तार का प्रतीक है। उनके अनुसार, ठेकुआ केवल भोजन नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की भावनाओं और परंपराओं से जुड़ा एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व

    ऐतिहासिक रूप से ठेकुआ का संबंध अत्यंत प्राचीन परंपराओं से जोड़ा जाता है। माना जाता है कि इसका उल्लेख ऋग्वैदिक काल में ‘अपूप’ नामक व्यंजन के रूप में मिलता है, जो गेहूं, गुड़, दूध और घी से तैयार किया जाता था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह सूर्य उपासना और अन्य अनुष्ठानों में विशेष रूप से उपयोग किया जाता रहा है। बौद्ध ग्रंथों में भी इस प्रकार के पकवानों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें कठिन तप और उपवास के दौरान ऊर्जा प्रदान करने वाला भोजन बताया गया है।

    स्वाद के साथ संस्कृति का विस्तार

    आज ठेकुआ केवल बिहार और झारखंड तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देश-विदेश में बसे भारतीय प्रवासियों के बीच भी लोकप्रिय हो चुका है। लोग इसे अपने घरों से दूर रहते हुए भी पारंपरिक स्वाद और भावनाओं से जोड़कर देखते हैं। प्रधानमंत्री द्वारा इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत किया जाना इस बात का संकेत है कि भारत की सांस्कृतिक जड़ें न केवल मजबूत हैं, बल्कि विश्व स्तर पर भी उनका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।

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