Last updated: August 4th, 2026 at 06:41 am

Prashant Kishor Biography: बिहार की राजनीति में इन दिनों जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर (PK) एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव की मतगणना के दौरान मिले शुरुआती रुझानों ने उन्हें सुर्खियों में ला दिया है। चुनावी रणनीतिकार से सक्रिय राजनीति तक का उनका सफर लगातार लोगों की दिलचस्पी का विषय बना हुआ है। ऐसे में आइए जानते हैं प्रशांत किशोर के परिवार, शिक्षा और राजनीतिक जीवन से जुड़ी अहम बातें।
रोहतास के गांव से शुरू हुआ सफर
प्रशांत किशोर का जन्म 20 मार्च 1977 को बिहार के रोहतास जिले के कोनार गांव में हुआ। उनका पैतृक घर आज भी गांव में मौजूद है, जबकि उनका बचपन बक्सर में बीता। परिवार का जुड़ाव आज भी बिहार की मिट्टी से बना हुआ है और राजनीति में सक्रिय होने के बाद भी वह अक्सर राज्य के अलग-अलग हिस्सों में लोगों के बीच नजर आते हैं।
परिवार और निजी जीवन
प्रशांत किशोर के पिता डॉ. श्रीकांत पांडेय सरकारी चिकित्सक थे, जबकि उनकी मां गृहिणी हैं। परिवार के अधिकांश सदस्य सार्वजनिक जीवन से दूर रहते हैं। उनकी पत्नी डॉ. जाह्नवी दास पेशे से डॉक्टर हैं और असम के गुवाहाटी की रहने वाली हैं। दोनों की मुलाकात संयुक्त राष्ट्र (UN) के एक स्वास्थ्य कार्यक्रम के दौरान हुई थी, जिसके बाद उन्होंने विवाह किया। दंपति का एक बेटा भी है, जो आमतौर पर सार्वजनिक जीवन से दूर रहता है।
शिक्षा और करियर
प्रशांत किशोर ने अपनी शुरुआती पढ़ाई बिहार में पूरी की। इसके बाद उन्होंने पटना साइंस कॉलेज से इंटरमीडिएट की शिक्षा हासिल की और आगे उच्च शिक्षा के बाद सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में काम किया। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र से जुड़े कई स्वास्थ्य एवं विकास कार्यक्रमों में भी अपनी सेवाएं दीं।
चुनावी रणनीतिकार से नेता बनने तक
प्रशांत किशोर ने देश के कई बड़े चुनाव अभियानों की रणनीति तैयार कर राष्ट्रीय पहचान बनाई। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में उनकी रणनीतिक भूमिका काफी चर्चा में रही। इसके बाद उन्होंने विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ काम किया और अंततः बिहार में जन सुराज अभियान शुरू कर सक्रिय राजनीति में कदम रखा।
बिहार की राजनीति में बढ़ती भूमिका
जन सुराज अभियान के जरिए प्रशांत किशोर लगातार बिहार के मुद्दों को लेकर जनता के बीच सक्रिय रहे हैं। बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के दौरान उनकी मौजूदगी ने राज्य की राजनीति में नई बहस को जन्म दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में उनकी भूमिका बिहार की राजनीति में और महत्वपूर्ण हो सकती है।
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