Last updated: October 9th, 2026 at 03:11 pm

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव से पहले ओबीसी आरक्षण का मुद्दा चर्चा में है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आयोग की रिपोर्ट पर असंतोष जताते हुए सवाल उठाया कि क्या आंकड़े जुटाने के लिए जमीनी स्तर पर जांच की गई थी या रिपोर्ट कार्यालय में बैठकर ही तैयार कर दी गई।
शुक्रवार को हाईकोर्ट में पंचायत चुनाव से संबंधित 11 याचिकाओं पर सुनवाई हुई। इन याचिकाओं में पंचायत चुनाव समय पर कराने की मांग की गई थी। साथ ही, योगी सरकार के 25 मई के फैसले को भी अदालत में चुनौती दी गई थी। सभी याचिकाओं को एक साथ जोड़कर सुना गया। मामले में अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को निर्धारित की गई।
दरअसल, उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव के लिए पिछड़े वर्गों के आरक्षण का निर्धारण करने के उद्देश्य से ओबीसी आयोग का गठन किया गया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के आदेश के बाद आयोग बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ही स्थानीय निकायों में ओबीसी आरक्षण से जुड़े फैसले लिए जाने थे।
आयोग की प्रमुख जिम्मेदारी ब्लॉक और पंचायत स्तर पर पिछड़े वर्गों की आबादी से संबंधित आंकड़े जुटाना और उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व की जरूरत का आकलन करना था। इसके आधार पर अलग-अलग स्थानीय निकायों में ओबीसी आरक्षित सीटों की संख्या निर्धारित की जानी थी।
आरक्षण तय करते समय अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए कुल आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक न होने का नियम भी महत्वपूर्ण है। ऐसे में आयोग की रिपोर्ट की सटीकता पंचायत चुनाव की आरक्षण व्यवस्था के लिए अहम मानी जा रही है।
अब हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद आयोग की रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया और आंकड़े जुटाने के तरीके पर सवाल खड़े हो गए हैं। आगामी सुनवाई में इस मामले में अदालत का रुख महत्वपूर्ण रहेगा।
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