Last updated: August 13th, 2026 at 04:04 pm

दिल्ली की आबकारी नीति से जुड़े कथित भ्रष्टाचार मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने अदालत में CBI की उस याचिका का विरोध किया है, जिसमें दोनों नेताओं को मामले से discharge किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई है।
मामला दिल्ली की 2021-22 आबकारी नीति से जुड़ा है। इस मामले में केंद्रीय जांच एजेंसी CBI ने कथित भ्रष्टाचार और नीति निर्माण एवं कार्यान्वयन में अनियमितताओं के आरोप लगाए थे।
केजरीवाल और सिसोदिया की ओर से अदालत में दलील दी गई कि CBI की चुनौती को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। दोनों नेताओं का पक्ष है कि निचली अदालत द्वारा उन्हें discharge करने के फैसले में हस्तक्षेप करने का पर्याप्त आधार नहीं है।
आबकारी नीति मामले में जांच लंबे समय से दिल्ली की राजनीति का बड़ा मुद्दा रहा है। इस मामले को लेकर आम आदमी पार्टी और केंद्र सरकार के बीच लगातार राजनीतिक टकराव देखने को मिला है।
CBI का आरोप है कि आबकारी नीति तैयार करने और लागू करने की प्रक्रिया में कुछ निजी कंपनियों और कारोबारियों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया। जांच एजेंसी ने कथित तौर पर नीति के निर्माण और उसके क्रियान्वयन में भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं।
दूसरी ओर AAP नेताओं ने इन आरोपों से इनकार किया है। पार्टी का लगातार कहना रहा है कि आबकारी नीति में किसी प्रकार का भ्रष्टाचार नहीं हुआ और जांच एजेंसियों की कार्रवाई राजनीतिक रूप से प्रेरित है।
अदालत में अब मुख्य सवाल यह है कि CBI की याचिका पर आगे सुनवाई की जाएगी या केजरीवाल और सिसोदिया के discharge को बरकरार रखा जाएगा।
Discharge का अर्थ यह है कि अदालत को उपलब्ध सामग्री के आधार पर आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं मिला। हालांकि discharge का अर्थ यह नहीं होता कि अदालत ने व्यक्ति को अंतिम रूप से निर्दोष घोषित कर दिया है; यह आपराधिक मुकदमे की प्रक्रिया के एक चरण से जुड़ा निर्णय होता है।
इस मामले में CBI ने निचली अदालत के discharge order को चुनौती दी है। एजेंसी का उद्देश्य यह साबित करना है कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों के खिलाफ आगे कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।
केजरीवाल और सिसोदिया की ओर से इसके विपरीत यह तर्क दिया जा रहा है कि जांच एजेंसी द्वारा प्रस्तुत सामग्री आरोप तय करने या मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
आबकारी नीति मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे दिल्ली की तत्कालीन सरकार के कई वरिष्ठ नेता जुड़े रहे हैं। जांच के दौरान कई लोगों से पूछताछ हुई और विभिन्न आरोपियों के खिलाफ अलग-अलग कानूनी कार्रवाई की गई।
मामले में अदालत की आगे की सुनवाई यह तय करेगी कि CBI की अपील पर क्या कार्रवाई होती है। यदि अदालत CBI की याचिका स्वीकार करती है तो दोनों नेताओं के खिलाफ मामले को आगे बढ़ाने का रास्ता खुल सकता है। यदि याचिका खारिज होती है तो discharge order को बड़ी राहत के रूप में देखा जाएगा।
AAP ने इस कानूनी लड़ाई को राजनीतिक मुद्दा भी बनाया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि केंद्र सरकार जांच एजेंसियों का इस्तेमाल विपक्षी नेताओं को निशाना बनाने के लिए कर रही है। वहीं केंद्र और जांच एजेंसियां इन आरोपों को खारिज करती रही हैं।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत तथ्यों, दस्तावेजों और जांच एजेंसी द्वारा पेश सामग्री का कानूनी आधार पर परीक्षण करेगी। किसी भी आरोपी की अंतिम आपराधिक जिम्मेदारी अदालत के अंतिम निर्णय से ही तय होगी।
दिल्ली की राजनीति में इस मामले का महत्व इसलिए भी बना हुआ है क्योंकि केजरीवाल और सिसोदिया AAP के प्रमुख नेताओं में शामिल हैं। आबकारी नीति से जुड़े मामलों ने पिछले कुछ वर्षों में पार्टी की राजनीति और नेतृत्व दोनों को प्रभावित किया है।
दिल्ली आबकारी नीति मामले में केजरीवाल और सिसोदिया ने CBI की discharge को चुनौती देने वाली याचिका का विरोध किया है। अब अदालत को यह तय करना है कि CBI की चुनौती में पर्याप्त कानूनी आधार है या पहले दिया गया discharge order बरकरार रहेगा।
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