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दिल्ली हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: पुलिस आरोपियों की गिरफ्तारी में ‘पिक एंड चूज’ नहीं कर सकती

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि पुलिस किसी मामले में आरोपियों में से चुनिंदा लोगों
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दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि पुलिस किसी मामले में आरोपियों में से चुनिंदा लोगों को गिरफ्तार करके बाकी आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई से बच नहीं सकती। अदालत ने पुलिस के ऐसे रवैये को ‘पिक एंड चूज’ यानी मनमाने तरीके से चुनकर गिरफ्तारी करने की नीति बताया और कहा कि इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने पुलिस से यह भी स्पष्ट करने को कहा कि वह किसी आरोपी को गिरफ्तार करना चाहती है या नहीं।

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    यह टिप्पणी न्यायमूर्ति गिरिश कठपालिया ने 31 अगस्त को दिए एक आदेश में की। मामला वर्ष 2024 में दर्ज एक कथित बाल तस्करी केस से जुड़ा है। अदालत के सामने आरोपी राजकुमार की जमानत याचिका आई थी। उस पर भारतीय दंड संहिता की धारा 370 और किशोर न्याय अधिनियम की धारा 81 के तहत मामला दर्ज किया गया था। आरोपी करीब ढाई साल से हिरासत में होने का दावा कर रहा था।

    जमानत याचिका में आरोपी की ओर से अदालत को बताया गया कि मामले में कई महत्वपूर्ण गवाहों के बयान पहले ही दर्ज हो चुके हैं और वह लंबे समय से जेल में है। बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि मामले में एक अन्य आरोपी को पहले ही जमानत मिल चुकी है, जबकि कथित मुख्य आरोपी के खिलाफ पुलिस ने अभी तक गिरफ्तारी की कार्रवाई नहीं की है। इसी आधार पर आरोपी ने अपने लिए भी राहत की मांग की।

    सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस की ओर से आरोपों की गंभीरता का हवाला देते हुए जमानत का विरोध किया गया। हालांकि, जांच अधिकारी ने अदालत के सामने स्वीकार किया कि कथित मुख्य आरोपी के खिलाफ अब तक व्यावहारिक रूप से कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई थी। पुलिस ने अदालत को आश्वासन दिया कि उस व्यक्ति को भी गिरफ्तार करने के लिए कदम उठाए जाएंगे।

    इसी बिंदु पर हाईकोर्ट ने पुलिस की जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि राज्य की ऐसी नीति स्वीकार नहीं की जा सकती जिसमें कुछ आरोपियों को गिरफ्तार किया जाए और अन्य को छोड़ दिया जाए। न्यायमूर्ति कठपालिया ने स्पष्ट किया कि पुलिस को यह साफ तौर पर बताना चाहिए कि वह किसी आरोपी को गिरफ्तार करना चाहती है या नहीं। अदालत ने इस तरह के ‘पिक एंड चूज’ रवैये को हतोत्साहित करने की बात कही।

    मामले का एक और गंभीर पहलू कथित तौर पर तस्करी की गई बच्ची से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने जांच अधिकारियों की भूमिका को लेकर कड़ी नाराजगी जताई क्योंकि सुनवाई के समय तक कथित रूप से तस्करी की गई बच्ची को पुलिस बरामद नहीं कर पाई थी। अदालत ने संबंधित पुलिस उपायुक्त को बच्ची को बरामद करने के लिए आवश्यक कदम उठाने और चार सप्ताह के भीतर स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया।

    हालांकि अदालत ने आरोपी राजकुमार को इस स्तर पर जमानत देने से इनकार कर दिया। यानी हाईकोर्ट की टिप्पणी का अर्थ यह नहीं है कि मामले के सभी आरोपियों को जमानत मिलनी चाहिए या पुलिस किसी आरोपी को गिरफ्तार ही न करे। अदालत का मुख्य जोर जांच प्रक्रिया में समानता, स्पष्टता और निष्पक्षता पर था। पुलिस को प्रत्येक आरोपी के संबंध में अपनी कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट करनी होगी।

    यह आदेश दिल्ली में आपराधिक मामलों की जांच के दौरान पुलिस की जिम्मेदारी को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खासकर उन मामलों में जहां एक से अधिक आरोपी हों, जांच एजेंसी को प्रत्येक आरोपी की भूमिका और उसके खिलाफ उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई करनी होगी। किसी आरोपी को केवल इसलिए कार्रवाई से बाहर रखना कि वह कथित तौर पर मुख्य आरोपी है या किसी अन्य कारण से, अदालत की निगरानी में सवालों के घेरे में आ सकता है।

    दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस को स्पष्ट संदेश दिया है कि गिरफ्तारी की कार्रवाई मनमाने ढंग से नहीं होनी चाहिए। अदालत ने आरोपियों को चुन-चुनकर गिरफ्तार करने की नीति पर आपत्ति जताई और कथित बाल तस्करी मामले में लापता बच्ची को जल्द बरामद करने के लिए पुलिस को निर्देश भी दिए हैं।

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