Last updated: September 5th, 2026 at 02:36 pm

बिहार सरकार ने केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI की जांच को लेकर एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक फैसला लिया है। राज्य में अब बिहार सरकार के कर्मचारियों और राज्य के नियंत्रण वाली संस्थाओं से जुड़े मामलों में CBI को जांच शुरू करने से पहले राज्य सरकार की पूर्व सहमति लेनी होगी। गृह विभाग की ओर से जारी नई अधिसूचना के बाद राज्य में CBI की जांच के अधिकार और प्रक्रिया को लेकर नई व्यवस्था लागू हो गई है।
नई व्यवस्था दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट एक्ट, 1946 की धारा 6 के तहत जारी की गई है। इस प्रावधान के तहत किसी राज्य में CBI को अपनी जांच शक्तियों का इस्तेमाल करने के लिए राज्य की सहमति की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। बिहार सरकार की नई अधिसूचना में अलग-अलग श्रेणी के मामलों के लिए सहमति की व्यवस्था को स्पष्ट किया गया है।
नई व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बिहार सरकार के कर्मचारियों से जुड़े मामलों को लेकर है। यदि किसी मामले में बिहार सरकार के कार्यों से जुड़े लोक सेवक या राज्य सरकार के नियंत्रण वाली किसी संस्था के कर्मचारी शामिल हैं, तो CBI को जांच शुरू करने से पहले बिहार सरकार की अनुमति लेनी होगी। राज्य सरकार से वित्तीय सहायता प्राप्त करने वाले कुछ संस्थान भी इस व्यवस्था के दायरे में रखे गए हैं।
इसके अलावा राज्य सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण वाली कंपनियों, निगमों और बैंकों से जुड़े मामलों में भी पहले अनुमति लेने का प्रावधान किया गया है। इसका अर्थ यह है कि इन श्रेणियों में आने वाले मामलों में CBI अपने स्तर पर सीधे जांच शुरू नहीं कर सकेगी। एजेंसी को बिहार सरकार के सामने औपचारिक प्रस्ताव रखना होगा और सरकार उस प्रस्ताव पर मामले के आधार पर निर्णय लेगी।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि बिहार में CBI के सभी अधिकार खत्म कर दिए गए हैं। केंद्र सरकार के कर्मचारियों, केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों और उनसे जुड़े मामलों के लिए सामान्य सहमति की व्यवस्था जारी रहेगी। निजी व्यक्तियों से जुड़े कुछ अपराधों के मामलों में भी अधिसूचना के तहत CBI को जांच की सहमति दी गई है। इसलिए नई व्यवस्था मुख्य रूप से बिहार सरकार के अपने कर्मचारियों और राज्य-नियंत्रित संस्थाओं से जुड़े मामलों पर केंद्रित है।
अधिसूचना में नए आपराधिक कानूनों और कुछ केंद्रीय कानूनों से जुड़े अपराधों को भी शामिल किया गया है। इनमें भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के साथ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से जुड़े प्रावधान भी शामिल हैं। इससे भविष्य में CBI जांच के मामलों को लेकर प्रक्रिया पहले से अधिक स्पष्ट हो सकती है।
सरकार की इस व्यवस्था का असर राज्य प्रशासन और केंद्रीय जांच एजेंसी के बीच समन्वय पर पड़ सकता है। अब यदि बिहार सरकार के किसी अधिकारी या राज्य नियंत्रित संस्था के खिलाफ CBI जांच की आवश्यकता सामने आती है तो एजेंसी को पहले राज्य सरकार के पास प्रस्ताव भेजना होगा। इसके बाद राज्य सरकार मामले की प्रकृति और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर अनुमति देने या नहीं देने का फैसला करेगी।
इस फैसले से राज्य सरकार के प्रशासनिक अधिकारों को भी मजबूती मिलती है। दूसरी ओर, CBI जांच चाहने वाले मामलों में प्रक्रिया एक अतिरिक्त चरण से गुजर सकती है। हालांकि, संवैधानिक अदालतों के आदेश से होने वाली CBI जांच इस प्रशासनिक सहमति की व्यवस्था से अलग हो सकती है।
बिहार सरकार के इस फैसले को ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जब केंद्रीय जांच एजेंसियों की भूमिका और राज्यों के अधिकारों को लेकर देशभर में लगातार बहस होती रही है। नई व्यवस्था में राज्य सरकार ने एक तरफ केंद्रीय कर्मचारियों और निजी व्यक्तियों से जुड़े निर्धारित मामलों में CBI को सामान्य सहमति दी है, वहीं अपने प्रशासनिक तंत्र से जुड़े मामलों में निर्णय लेने का अधिकार अपने पास रखा है।
नई अधिसूचना के लागू होने के बाद बिहार में CBI जांच की प्रक्रिया दो अलग-अलग श्रेणियों में स्पष्ट होती दिखाई दे रही है। केंद्रीय कर्मचारियों और निर्धारित मामलों में एजेंसी को सामान्य सहमति का लाभ मिलेगा, जबकि बिहार सरकार के कर्मचारियों और राज्य-नियंत्रित संस्थाओं से जुड़े मामलों में पहले राज्य सरकार की मंजूरी आवश्यक होगी। आने वाले समय में इस व्यवस्था का वास्तविक प्रभाव उन मामलों में दिखाई देगा, जहां CBI और बिहार सरकार के अधिकार क्षेत्र आपस में जुड़े होंगे।
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