Last updated: September 27th, 2026 at 03:31 pm

उत्तर प्रदेश के मऊ जिले से जुड़े एक पुराने आपराधिक मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस और अभियोजन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने मामले में गवाहों को पेश कराने में हुई लंबी देरी को देखते हुए राज्य सरकार को मऊ जिले में वर्ष 2023 से अब तक तैनात रहे पुलिस अधीक्षकों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि आपराधिक मुकदमे की सुनवाई को आगे बढ़ाने में अभियोजन पक्ष की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण होती है।
मामला वर्ष 2017 में दर्ज एक अपहरण प्रकरण से जुड़ा है। अदालत के अनुसार, याचिकाकर्ता के 14 वर्षीय बेटे का 27 सितंबर 2017 को कथित तौर पर अपहरण हुआ था। अब तक न तो किशोर का पता चला है और न ही उसके अवशेष मिलने की जानकारी सामने आई है। मामले में छह आरोपियों के खिलाफ मार्च 2023 में आरोप तय किए गए थे, लेकिन इसके बाद भी मुकदमे की सुनवाई अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सकी।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि अभियोजन पक्ष के कुल 54 गवाहों में से केवल दो की ही गवाही दर्ज हो सकी है। अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर ध्यान दिया कि मार्च 2023 में आरोप तय होने के बाद भी तीन साल से अधिक समय में केवल दो गवाहों की जांच हुई। अदालत ने इस स्थिति को आपराधिक मुकदमे को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी के संदर्भ में गंभीर माना।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ कर रही है। अदालत के 21 सितंबर के आदेश में अभियोजन पक्ष द्वारा गवाहों को अदालत में पेश नहीं किए जाने पर सवाल उठाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी की भी जिम्मेदारी है कि मुकदमे के दौरान आवश्यक गवाहों को अदालत के सामने पेश कराने में सहयोग करे।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मऊ के मौजूदा पुलिस अधीक्षक भी पेश हुए थे। अदालत ने अगस्त में दिए गए अपने आदेश के बाद उनसे मामले की प्रगति के बारे में जानकारी मांगी थी। पुलिस अधीक्षक की ओर से 29 अगस्त को हलफनामा भी दाखिल किया गया था। इसमें अदालत को बताया गया कि आरोप तय होने के बाद 54 में से केवल दो अभियोजन गवाहों की जांच हो पाई है।
अदालत ने इस स्थिति को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि 2023 से अब तक मऊ में पुलिस अधीक्षक के पद पर रहे अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू की जाए। आदेश के मुताबिक यह प्रक्रिया दो सप्ताह के भीतर शुरू की जानी है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि उसे लगा कि अधिकारियों के खिलाफ विभागीय आरोप केवल औपचारिकता के लिए लगाए गए हैं, तो संबंधित आरोप-पत्र जारी करने वाले सक्षम अधिकारी के खिलाफ भी कार्रवाई पर विचार किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव से व्यक्तिगत रूप से सत्यापित हलफनामा दाखिल करने को भी कहा है। इसमें अगली सुनवाई तक यह जानकारी देनी होगी कि अदालत के निर्देश के बाद क्या कार्रवाई की गई। मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर को निर्धारित की गई है।
यह मामला पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने भी पहुंचा था। याचिकाकर्ता ने जांच को केंद्रीय जांच ब्यूरो या किसी अन्य एजेंसी को सौंपने की मांग की थी। हाईकोर्ट ने मई 2025 में मामले पर सुनवाई करते हुए राज्य की ओर से दी गई जानकारी को दर्ज किया था कि जांच पूरी हो चुकी है और आरोपपत्र अदालत में दाखिल किया जा चुका है। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट की ताजा कार्रवाई का मुख्य केंद्र जांच के बजाय मुकदमे की सुनवाई में गवाहों को पेश कराने और अभियोजन की जिम्मेदारी से जुड़ा है। अदालत के आदेश के बाद अब राज्य सरकार को विभागीय कार्रवाई शुरू करने के साथ-साथ मामले की न्यायिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी भी देनी होगी।
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