Last updated: October 27th, 2026 at 03:27 pm

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर की विशेष एमपी-एमएलए अदालत ने कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को वर्ष 2018 के मानहानि मामले में बरी कर दिया है। यह मामला केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के संबंध में की गई एक कथित आपत्तिजनक टिप्पणी से जुड़ा था। अदालत ने 26 अक्टूबर 2026 को फैसला सुनाते हुए कहा कि शिकायतकर्ता यह साबित नहीं कर सका कि राहुल गांधी की टिप्पणी से उसकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा था। इस फैसले से राहुल गांधी को लगभग आठ साल से चल रहे मुकदमे में बड़ी कानूनी राहत मिली है।
राहुल गांधी सोमवार को फैसले के समय सुल्तानपुर की अदालत में मौजूद थे। मामले की सुनवाई अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट शुभम वर्मा की अदालत में हुई। फैसले के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने इसे सत्य और न्याय की जीत बताया। वहीं, इस निर्णय ने राजनीतिक भाषणों, मानहानि कानून और अदालत में शिकायत दर्ज कराने के कानूनी अधिकार को लेकर एक बार फिर चर्चा शुरू कर दी है।
यह मामला 8 मई 2018 को कर्नाटक विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान बेंगलुरु में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस से जुड़ा है। उस समय अमित शाह भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। राहुल गांधी ने एक सवाल के जवाब में शाह के खिलाफ सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ मामले के संदर्भ में टिप्पणी की थी। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि इस बयान से अमित शाह की छवि को नुकसान पहुंचा और भाजपा कार्यकर्ता होने के कारण उसकी प्रतिष्ठा भी प्रभावित हुई।
सुल्तानपुर के तत्कालीन भाजपा पदाधिकारी विजय मिश्रा ने 4 अगस्त 2018 को राहुल गांधी के खिलाफ आपराधिक मानहानि की शिकायत दर्ज कराई थी। मिश्रा जिला सहकारी बैंक के पूर्व अध्यक्ष भी रह चुके हैं। शिकायत में आरोप लगाया गया कि राहुल गांधी की टिप्पणी मानहानिकारक थी और इससे भाजपा से जुड़े लोगों की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची। मामला शुरू में दीवानी अदालत में दाखिल हुआ, लेकिन बाद में विधायकों और सांसदों से संबंधित मामलों की सुनवाई करने वाली विशेष अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया।
नवंबर 2023 में अदालत ने राहुल गांधी को मुकदमे का सामना करने के लिए तलब किया था। फरवरी 2024 में राहुल गांधी अदालत में पेश हुए और उन्हें जमानत मिल गई। इसके बाद कई चरणों में सुनवाई हुई। शिकायतकर्ता की ओर से बयान की रिकॉर्डिंग से राहुल गांधी की आवाज का मिलान कराने की मांग भी की गई थी। इस संबंध में निचली अदालत और बाद में उच्च न्यायालय तक कानूनी प्रक्रिया चली, लेकिन आवाज के नमूने से जुड़ी मांग को मंजूरी नहीं मिली।
फैसले में अदालत ने शिकायतकर्ता के कानूनी अधिकार पर भी सवाल उठाया। अदालत के अनुसार, विजय मिश्रा यह साबित नहीं कर सके कि वह इस टिप्पणी से सीधे प्रभावित व्यक्ति थे और कानून के तहत इस मामले में मानहानि की शिकायत करने के पात्र थे। अदालत ने कहा कि राहुल गांधी की टिप्पणी मुख्य रूप से अमित शाह और अधिकतम भाजपा के संदर्भ में थी। शिकायतकर्ता का नाम बयान में नहीं लिया गया था और न ही यह पर्याप्त रूप से साबित हुआ कि बयान से उसकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।
अदालत ने गवाहों के बयानों में मौजूद विसंगतियों और स्वतंत्र गवाहों की कमी पर भी ध्यान दिया। शिकायतकर्ता की ओर से पेश साक्ष्य आरोपों को पर्याप्त रूप से साबित नहीं कर सके। अदालत ने माना कि केवल किसी राजनीतिक दल से जुड़ा होना अपने आप में उस दल या उसके किसी नेता के बारे में की गई टिप्पणी के आधार पर व्यक्तिगत मानहानि का मुकदमा दायर करने का पर्याप्त आधार नहीं है।
इस फैसले का महत्व राजनीतिक अभिव्यक्ति और मानहानि कानून के बीच संतुलन के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में नेताओं के सार्वजनिक बयानों की आलोचना और राजनीतिक बहस को महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाले बयान कानूनी विवाद का कारण भी बन सकते हैं। ऐसे मामलों में अदालत को यह देखना होता है कि शिकायतकर्ता वास्तव में प्रभावित व्यक्ति है या नहीं और आरोपों के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं या नहीं।
राहुल गांधी को इस मामले में बरी किए जाने का अर्थ यह है कि सुल्तानपुर में दर्ज इस विशेष आपराधिक मानहानि शिकायत में उनके खिलाफ आरोप साबित नहीं हुए। यह फैसला उनके खिलाफ चल रहे अन्य मामलों पर अपने आप लागू नहीं होता। फिलहाल, सुल्तानपुर अदालत के निर्णय से कांग्रेस नेता को राहत मिली है और लगभग आठ वर्षों से चल रही इस कानूनी लड़ाई का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया है।
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