Last updated: September 2nd, 2026 at 10:28 am

नई दिल्ली: मैटरनिटी लीव के बाद महिला कर्मचारियों के साथ होने वाले भेदभाव को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि मातृत्व किसी महिला के करियर में नुकसान या असमान व्यवहार का आधार नहीं बन सकता। सामान्य स्थिति में मैटरनिटी लीव से वापस लौटने वाली महिला कर्मचारी को उसी पद पर काम करने का अधिकार है, जिस पद पर वह छुट्टी पर जाने से पहले कार्यरत थी।
जस्टिस सचिन दत्ता की पीठ ने कहा कि अगर पुराना पद उपलब्ध नहीं है, तो नियोक्ता को महिला कर्मचारी को समान वेतन, ग्रेड, पद, जिम्मेदारियों, अधिकारों और करियर की संभावनाओं वाला वैकल्पिक पद देना होगा।
पुराना पद उपलब्ध न होने पर देनी होगी पूरी जानकारी
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि महिला के वापस लौटने तक उसका पुराना पद उपलब्ध नहीं रहता है, तो नियोक्ता को इसकी जानकारी उसे पहले से देनी चाहिए। साथ ही, वैकल्पिक पद से जुड़ी पूरी जानकारी भी साझा करनी होगी। इसमें वेतन, ग्रेड, जिम्मेदारियां और रिपोर्टिंग व्यवस्था जैसी जानकारियां शामिल होंगी।
केंद्र को 6 महीने में नियम बनाने का निर्देश
दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को सोशल सिक्योरिटी कोड के तहत आवश्यक नियम छह महीने के भीतर तैयार करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि नियमों में मैटरनिटी लीव के बाद महिलाओं की कार्यस्थल पर वापसी से जुड़े प्रावधान स्पष्ट होने चाहिए।
इन नियमों में स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए जरूरी सहायता, क्रेच सुविधा और शिकायतों के निपटारे की समय-सीमा जैसे पहलुओं को शामिल करने पर भी विचार किया जाना चाहिए।
निजी कंपनी में काम करने वाली महिला की याचिका पर फैसला
यह मामला एक ऐसी महिला कर्मचारी की याचिका से जुड़ा था, जिसे 2022 में एक निजी कंपनी में चार्टर्ड अकाउंटेंट के तौर पर नियुक्त किया गया था। याचिका के अनुसार, गर्भावस्था की जानकारी देने के कुछ समय बाद उसे दूसरी टीम में स्थानांतरित कर दिया गया।
मैटरनिटी लीव से लौटने के बाद महिला को बताया गया कि उसकी पुरानी टीम में पद उपलब्ध नहीं है। इसके बाद उसे ट्रेजरी विभाग में भेज दिया गया। महिला का दावा था कि नई भूमिका उसकी पहले की जिम्मेदारियों और पद के अनुरूप नहीं थी।
महिला ने हाईकोर्ट से पुराने पद पर वापस नियुक्त करने की मांग की थी। इसके अलावा उसने कथित मानसिक और भावनात्मक उत्पीड़न के लिए 50 लाख रुपये के मुआवजे की भी मांग की थी।
कंपनी ने क्या दलील दी?
कंपनी ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि वह एक निजी संस्था है और उसके खिलाफ इस तरह की सेवा संबंधी मांग पर याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। कंपनी ने पदावनति के आरोपों से भी इनकार किया। उसका कहना था कि महिला के वेतन, पद और वार्षिक वेतन वृद्धि में कोई कमी नहीं की गई थी।
महिला को 10 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने 88 पन्नों के फैसले में कंपनी को महिला को 10 लाख रुपये का मुआवजा और 1.5 लाख रुपये मुकदमे का खर्च देने का निर्देश दिया। यह भुगतान आठ सप्ताह के भीतर करने को कहा गया है।
हालांकि, अदालत ने महिला को दोबारा नौकरी पर रखने का आदेश नहीं दिया, क्योंकि वह पहले ही कंपनी से इस्तीफा दे चुकी थी।
‘मां बनना करियर के नुकसान की वजह नहीं हो सकता’
अदालत ने कहा कि किसी महिला को मातृत्व से जुड़े अधिकारों का इस्तेमाल करने के लिए दंडित करना या उसे मातृत्व और करियर में से किसी एक को चुनने की स्थिति में डालना संवैधानिक मूल्यों के विपरीत है।
कोर्ट के अनुसार, गर्भावस्था या मैटरनिटी लीव के कारण किसी महिला की पेशेवर तरक्की रोकना, प्रमोशन प्रभावित करना या उसकी जिम्मेदारियां कम करना स्वीकार्य नहीं है। ऐसा व्यवहार मातृत्व लाभ से जुड़े कानून की भावना के विपरीत होने के साथ-साथ समानता के संवैधानिक अधिकार से भी जुड़ा गंभीर सवाल खड़ा कर सकता है।
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