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पाकिस्तान में बदला सैन्य ढांचा, आसिम मुनीर को मिली बड़ी ताकत; तीनों सेनाओं की कमान एक पद के तहत

पाकिस्तान ने कई दशकों बाद अपने सैन्य कमांड ढांचे में बड़ा बदलाव किया है। इस नई व्यवस्था के बाद फील्ड
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पाकिस्तान ने कई दशकों बाद अपने सैन्य कमांड ढांचे में बड़ा बदलाव किया है। इस नई व्यवस्था के बाद फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की शक्तियां काफी बढ़ गई हैं। उन्हें चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (CDF) का पद मिलने के बाद थल सेना, नौसेना और वायु सेना के बीच ऑपरेशनल कमान और समन्वय की जिम्मेदारी एक ही शीर्ष सैन्य पद के तहत आ गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इस बदलाव का असर पाकिस्तान के सिविल-मिलिट्री संबंधों पर भी पड़ सकता है।

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    ज्वाइंट चीफ्स के पुराने पद की जगह नया ढांचा

    अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में अब तक सेना की तीनों शाखाओं की कमान अलग-अलग सैन्य अधिकारियों के पास रहती थी। ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के चेयरमैन का मुख्य काम तीनों सेनाओं के बीच समन्वय करना था, लेकिन उनके पास तीनों सेनाओं की सीधी कमान नहीं होती थी।

    अब इस व्यवस्था में बदलाव करते हुए ज्वाइंट चीफ्स के चेयरमैन का पद समाप्त कर चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज का पद बनाया गया है। यह पद 2025 में किए गए संवैधानिक संशोधन के जरिए अस्तित्व में आया।

    आसिम मुनीर के हाथ में तीनों सेनाओं की ऑपरेशनल कमान

    नई व्यवस्था में आसिम मुनीर को तीनों सैन्य शाखाओं के बीच ऑपरेशनल कमान और नियंत्रण से जुड़ी व्यापक जिम्मेदारियां मिली हैं। इससे पाकिस्तान के सैन्य ढांचे में एक अधिकारी की भूमिका पहले के मुकाबले कहीं अधिक प्रभावशाली हो गई है।

    इस बदलाव को पाकिस्तान की रक्षा व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण पुनर्गठन माना जा रहा है। खासकर थल सेना, नौसेना और वायु सेना के बीच संयुक्त अभियानों और रणनीतिक फैसलों में CDF की भूमिका अहम होगी।

    परमाणु कमान में भी बढ़ सकती है भूमिका

    पाकिस्तान की परमाणु व्यवस्था में भी CDF की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नेशनल कमांड अथॉरिटी के प्रमुख होते हैं, जो देश के परमाणु हथियारों से जुड़े मामलों की देखरेख करती है।

    रिपोर्ट के मुताबिक, CDF को इस व्यवस्था में डिप्टी चेयरमैन की भूमिका मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा पाकिस्तान की परमाणु क्षमता वाली सेनाओं की देखरेख करने वाले नेशनल स्ट्रैटेजिक कमांड के नेतृत्व से जुड़े फैसलों में भी CDF की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

    भारत-पाकिस्तान संघर्ष के बाद बदलाव पर जोर

    इस सैन्य पुनर्गठन को मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए चार दिवसीय संघर्ष के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। उस दौरान जमीन, हवा, समुद्र, साइबर, मिसाइल और ड्रोन जैसे कई क्षेत्रों में सैन्य समन्वय का महत्व सामने आया था।

    नई व्यवस्था के समर्थकों का तर्क है कि पुराना सैन्य ढांचा तीनों सेनाओं के बीच प्रभावी संयुक्त कमान सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त नहीं था। इसी वजह से एकीकृत कमांड व्यवस्था की जरूरत महसूस की गई।

    पाकिस्तान की राजनीति पर भी पड़ सकता है असर

    पाकिस्तान के इतिहास में सेना की भूमिका हमेशा से बेहद प्रभावशाली रही है। 1947 में देश के अस्तित्व में आने के बाद वहां कई बार सैन्य शासन रहा है और तीन दशकों से अधिक समय तक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सेना का राजनीतिक प्रभाव दिखाई देता रहा है।

    संवैधानिक व्यवस्था के तहत सेना निर्वाचित सरकार के अधीन होती है, लेकिन व्यवहार में सेना पाकिस्तान की सबसे शक्तिशाली संस्थाओं में गिनी जाती रही है। ऐसे में सेना प्रमुख को अतिरिक्त अधिकार देने वाली नई व्यवस्था से देश के सिविल-मिलिट्री संतुलन को लेकर बहस और तेज हो सकती है।

    अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि नई कमांड संरचना पाकिस्तान की सैन्य क्षमता को कितना मजबूत करती है और इससे देश की राजनीतिक व्यवस्था में सेना की भूमिका किस दिशा में आगे बढ़ती है।

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