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बिहार में फरक्का संधि पर JDU का ‘नीतीश संवाद’ अभियान, 12 जिलों में लोगों से संपर्क

बिहार में बाढ़ और गंगा नदी के जल प्रबंधन का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ
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बिहार में बाढ़ और गंगा नदी के जल प्रबंधन का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने फरक्का बैराज और भारत-बांग्लादेश गंगा जल बंटवारा समझौते को लेकर अपना अभियान तेज कर दिया है। पार्टी ने गंगा किनारे बसे बिहार के 12 जिलों में ‘नीतीश संवाद’ अभियान शुरू किया है। इस अभियान के जरिए लोगों के बीच फरक्का बैराज से जुड़े मुद्दों और बिहार के हितों को लेकर पार्टी का पक्ष रखा जा रहा है।

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    JDU का यह अभियान ऐसे समय में शुरू हुआ है जब 1996 में भारत और बांग्लादेश के बीच हुई गंगा जल बंटवारा संधि की 30 साल की अवधि दिसंबर 2026 में पूरी होने वाली है। पार्टी चाहती है कि संधि के भविष्य को लेकर होने वाली बातचीत में बिहार के हितों को प्रमुखता से शामिल किया जाए। JDU नेताओं का कहना है कि बिहार लंबे समय से फरक्का बैराज के कारण गंगा में गाद जमा होने और नदी की जलधारण क्षमता प्रभावित होने की समस्या उठाता रहा है।

     

    ‘नीतीश संवाद’ अभियान के तहत पार्टी की टीमें गंगा किनारे स्थित 12 जिलों में लोगों से संपर्क कर रही हैं। इनमें बक्सर, भोजपुर, बेगूसराय और खगड़िया समेत अन्य जिले शामिल हैं। अब तक अभियान के तहत इन चार जिलों का दौरा किया जा चुका है। पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा इस अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं। अभियान में लोगों को पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के फरक्का बैराज से जुड़े पुराने बयानों और उनके रुख के बारे में भी जानकारी दी जा रही है।

     

    JDU का कहना है कि फरक्का बैराज की वजह से गंगा में बड़ी मात्रा में गाद जमा होने की समस्या बढ़ी है। पार्टी का तर्क है कि इससे नदी की तलहटी ऊंची हुई और पानी के प्रवाह तथा निकासी पर असर पड़ा, जिससे बिहार के कई हिस्सों में बाढ़ की समस्या गंभीर हुई। हालांकि, फरक्का बैराज को बिहार में आने वाली बाढ़ का एकमात्र कारण मानना विशेषज्ञों के बीच सर्वसम्मत निष्कर्ष नहीं है। नदी का प्रवाह, गाद, तटबंध, स्थानीय बारिश, ऊपरी क्षेत्रों से आने वाला पानी और गंगा के ऊंचे जलस्तर जैसे कई कारक बाढ़ को प्रभावित करते हैं।

     

    1996 की गंगा जल बंटवारा संधि भारत और बांग्लादेश के बीच फरक्का पर गंगा के पानी के बंटवारे से संबंधित है। यह समझौता 12 दिसंबर 1996 को हुआ था और इसकी अवधि 30 वर्ष निर्धारित की गई थी। संधि मुख्य रूप से सूखे मौसम में पानी के बंटवारे की व्यवस्था तय करती है। अब इसकी अवधि समाप्त होने के करीब आने के साथ दोनों देशों के बीच भविष्य की व्यवस्था को लेकर चर्चा महत्वपूर्ण हो गई है।

     

    बिहार सरकार की ओर से भी इस मुद्दे पर राज्य के हितों को प्राथमिकता देने की मांग सामने आई है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा है कि संधि में बिहार के हितों की रक्षा होनी चाहिए। राज्य सरकार का कहना है कि बिहार को गंगा के पानी का पर्याप्त प्रवाह पूरे वर्ष मिलना चाहिए और गाद की बढ़ती समस्या का समाधान भी जरूरी है।

     

    फरक्का बैराज को लेकर बिहार की चिंताएं नई नहीं हैं। नीतीश कुमार लंबे समय से इस परियोजना की भूमिका पर सवाल उठाते रहे हैं। अब संधि की अवधि समाप्त होने की समय सीमा नजदीक आने के कारण JDU इस मुद्दे को राजनीतिक और जनसंपर्क अभियान के रूप में आगे बढ़ा रही है। पार्टी का कहना है कि वह संधि के नवीनीकरण के बजाय बिहार की जरूरतों के अनुरूप नए सिरे से व्यवस्था पर चर्चा चाहती है।

     

    हालांकि, बिहार की बाढ़ की समस्या केवल फरक्का बैराज तक सीमित नहीं है। हालिया बाढ़ के दौरान गंगा, गंडक, कोसी, बूढ़ी गंडक, पुनपुन और घाघरा जैसी नदियों के जलस्तर में वृद्धि हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार नदी प्रबंधन में तटबंधों के साथ जल निकासी, बाढ़ क्षेत्र की सुरक्षा, आर्द्रभूमि संरक्षण और बेहतर चेतावनी व्यवस्था पर भी ध्यान देना जरूरी है।

     

    ऐसे में ‘नीतीश संवाद’ अभियान के जरिए JDU ने फरक्का के मुद्दे को एक बार फिर बिहार की राजनीति में प्रमुखता से सामने ला दिया है। दिसंबर में संधि की अवधि पूरी होने से पहले यह मुद्दा आगे और राजनीतिक बहस का हिस्सा बन सकता है।

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